रिलीज़ से पहले मनोज वाजपेयी की फिल्म “घुसखोर पंडित” के खिलाफ जोरदार विरोध
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मनोज वाजपेयी की फिल्म “घुसखोर पंडित” को शीर्षक और कहानी के कारण विरोध का सामना, कई समूहों ने सेंसर बोर्ड से कार्रवाई की मांग की।
निर्माताओं ने स्पष्ट किया कि फिल्म काल्पनिक व्यंग्य है और किसी समुदाय या वर्ग को निशाना नहीं बनाती, केवल भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करती है।
कई शहरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, वहीं दर्शक और समीक्षक रचनात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में सामने आए, रिलीज़ को लेकर चर्चा जारी।
Delhi / मनोज वाजपेयी की आगामी फिल्म “घुसखोर पंडित” रिलीज़ से पहले ही विवादों में घिर गई है। फिल्म के शीर्षक और कहानी के कुछ हिस्सों को लेकर कुछ संगठनों और सामाजिक समूहों ने तीव्र आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि शीर्षक में उपयोग किया गया शब्द विशेष वर्ग को गलत ढंग से प्रस्तुत कर सकता है, जबकि फिल्म निर्माण टीम का दावा है कि कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या समुदाय से इसका कोई संबंध नहीं है।
विरोध करने वाले समूहों ने फिल्म के पोस्टर और ट्रेलर जारी होने के बाद सोशल मीडिया पर अभियान चलाया। उनका आरोप है कि व्यंग्य और भ्रष्टाचार पर आधारित कहानी को ऐसा नाम देना उचित नहीं है जो किसी विशेष पहचान से जुड़ा हो। पटना, दिल्ली और वाराणसी में कुछ स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी किए गए, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने सेंसर बोर्ड से फिल्म का शीर्षक बदलने और समीक्षा प्रक्रिया को मजबूत करने की मांग की।
वहीं, फिल्म के निर्देशक और निर्माता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि “घुसखोर पंडित” एक काल्पनिक व्यंग्य फिल्म है जो सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार, बिचौलियों और लालफीताशाही को उजागर करती है। उन्होंने यह भी कहा कि शीर्षक का उद्देश्य किसी समुदाय पर प्रहार करना नहीं है, बल्कि समाज में मौजूद भ्रष्ट मानसिकता की ओर संकेत करना है। मेकर्स का कहना है कि फिल्म का मुख्य संदेश भ्रष्टाचार विरोध और शासन-प्रणाली में पारदर्शिता को बढ़ावा देना है।
एक्टिंग के लिए मशहूर मनोज वाजपेयी ने भी कहा कि वह हमेशा सार्थक और सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों का हिस्सा रहे हैं, और यह फिल्म भी उसी श्रेणी में आती है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि फिल्म को देखने से पहले उसकी मंशा को समझें और किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले कहानी पर ध्यान दें।
फिल्म के विरोध के बीच कई फिल्म समीक्षकों और दर्शकों ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी है। उनका मानना है कि किसी भी रचनात्मक कार्य को लेकर असहमति हो सकती है, लेकिन सेंसर बोर्ड द्वारा मंजूरी के बाद फिल्मों को केवल शीर्षक के आधार पर विवादों में घसीटना उचित नहीं है।
अब देखना होगा कि बढ़ते विरोध के बीच निर्माताओं या सेंसर बोर्ड द्वारा कोई बदलाव किया जाता है या फिल्म तय समय पर रिलीज़ होती है।