पूर्व लोक सभा अध्यक्ष एम. अनन्तशयनम आयंगर को संसद में दी गई श्रद्धांजलि

Wed 04-Feb-2026,03:39 PM IST +05:30

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पूर्व लोक सभा अध्यक्ष एम. अनन्तशयनम आयंगर को संसद में दी गई श्रद्धांजलि M-Ananthasayanam-Ayyangar-Jayanti-Parliament-Tribute
  • एम. अनन्तशयनम आयंगर की जयंती पर संसद में श्रद्धांजलि, लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उनके लोकतांत्रिक योगदान को किया याद।

  • सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने जाने वाले आयंगर ने संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को दी नई मजबूती।

Delhi / New Delhi :

Delhi/ संविधान और संसदीय परंपराओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाने वाले भारत के पूर्व लोक सभा अध्यक्ष श्री एम. अनन्तशयनम आयंगर की जयंती पर आज संसद भवन के संविधान सदन स्थित केंद्रीय कक्ष में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया। लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर उनके योगदान को याद किया। इस अवसर पर संसद के वरिष्ठ सदस्यों, पूर्व सांसदों और उच्च अधिकारियों ने भी लोकतंत्र के इस स्तंभ को नमन किया।
लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने श्री एम. अनन्तशयनम आयंगर की जयंती पर उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि श्री आयंगर भारतीय संसदीय इतिहास के ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करने में आजीवन योगदान दिया। राज्य सभा के उपसभापति श्री हरिवंश, कई सांसदों, पूर्व सांसदों और लोक सभा के महासचिव श्री उत्पल कुमार सिंह ने भी इस अवसर पर श्रद्धासुमन अर्पित किए।

श्री एम. ए. आयंगर एक वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक दूरदर्शी सांसद और कुशल संसदीय प्रशासक थे। वे केंद्रीय विधान सभा, संविधान सभा, अंतरिम संसद और पहली से तीसरी लोक सभाओं के सदस्य रहे। वर्ष 1952 में पहली लोक सभा के गठन के समय उन्हें सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुना गया, जो उनके प्रति सभी दलों के विश्वास को दर्शाता है।

इससे पहले वे संविधान सभा (विधायी) और अस्थायी संसद के उपाध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके थे। तत्कालीन लोक सभा अध्यक्ष श्री जी. वी. मावलंकर के आकस्मिक निधन के बाद 8 मार्च 1956 को श्री आयंगर को सर्वसम्मति से लोक सभा का अध्यक्ष चुना गया। वर्ष 1957 में वे दूसरी लोक सभा के लिए पुनः सर्वसम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

तीसरी लोक सभा के लिए निर्वाचित होने के बाद उन्होंने बिहार के राज्यपाल का दायित्व संभालने हेतु अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। उनका संपूर्ण जीवन लोकतंत्र, अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों को समर्पित रहा। 19 मार्च 1978 को उनके निधन के बावजूद उनका योगदान आज भी भारतीय संसद की कार्यप्रणाली में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है