पार्किंसन और नींद का गहरा रिश्ता: क्या रात की गहरी नींद तय करती है दिमाग का भविष्य?

Mon 26-Jan-2026,12:45 AM IST +05:30

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पार्किंसन और नींद का गहरा रिश्ता: क्या रात की गहरी नींद तय करती है दिमाग का भविष्य? Parkinson Disease
  • गहरी नींद दिमाग से विषैले प्रोटीन हटाने में मदद करती है. 

  • नींद की समस्या पार्किंसन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. 

  • बेहतर नींद से पार्किंसन का खतरा कम हो सकता है.

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / पार्किंसन रोग को आमतौर पर हाथों की कंपन, मांसपेशियों की जकड़न और डोपामिन हार्मोन की कमी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अब वैज्ञानिक शोध इस बीमारी की जड़ों को नींद से भी जोड़ रहे हैं। आधुनिक न्यूरोसाइंस के अनुसार नींद केवल शरीर को आराम देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह दिमाग की सफ़ाई और मरम्मत का सबसे महत्वपूर्ण समय होती है। नींद के दौरान, विशेष रूप से गहरी नींद में, दिमाग का एक विशेष तंत्र सक्रिय होता है जिसे ग्लिम्फैटिक सिस्टम कहा जाता है। यह प्रणाली दिमाग में जमा ज़हरीले प्रोटीन, रासायनिक कचरे और बेकार पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती है। पार्किंसन रोग में अल्फा-सिन्यूक्लिन नामक एक प्रोटीन दिमाग में असामान्य रूप से जमा होने लगता है, जो तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और धीरे-धीरे बीमारी को जन्म देता है। शोध बताते हैं कि यदि नींद पूरी न हो, बार-बार टूटे या गहरी नींद की मात्रा कम हो, तो ग्लिम्फैटिक सिस्टम इस हानिकारक प्रोटीन को प्रभावी ढंग से साफ़ नहीं कर पाता। खासकर स्लो-वेव स्लीप यानी गहरी नींद के दौरान दिमाग के भीतर तरल पदार्थों का प्रवाह सबसे तेज होता है और सफ़ाई की प्रक्रिया सबसे अधिक सक्रिय रहती है। यदि यह अवस्था बार-बार बाधित हो, तो दिमाग की मरम्मत अधूरी रह जाती है और विषैले तत्व जमा होने लगते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि लंबे समय तक खराब नींद पार्किंसन जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए अनुकूल वातावरण बना सकती है, जिससे यह रोग धीरे-धीरे पनपता है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि नींद से जुड़ी समस्याएँ अक्सर पार्किंसन के स्पष्ट लक्षणों से कई साल पहले दिखाई देने लगती हैं। REM स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर, जिसमें व्यक्ति सपनों को शारीरिक रूप से जीने लगता है, अचानक नींद से उठ जाना, डरावने या असामान्य सपने और पुरानी अनिद्रा—इन सभी को पार्किंसन के शुरुआती संकेतों के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि नींद की गड़बड़ी केवल बीमारी का परिणाम नहीं, बल्कि उसका प्रारंभिक संकेत या संभावित कारण भी हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ उच्च रक्तचाप, मधुमेह, स्लीप एपनिया और शरीर की जैविक घड़ी यानी सर्कैडियन रिदम का बिगड़ना दिमाग की सफ़ाई प्रक्रिया को और धीमा कर देता है। आधुनिक जीवनशैली, देर रात तक मोबाइल और स्क्रीन का उपयोग, अनियमित दिनचर्या और लगातार तनाव नींद की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। जानवरों पर किए गए प्रयोगों में यह पाया गया है कि जब गहरी नींद को बेहतर बनाया गया, तो दिमाग में अल्फा-सिन्यूक्लिन का जमाव कम हुआ और ग्लिम्फैटिक सिस्टम अधिक प्रभावी ढंग से काम करने लगा। इससे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यदि समय रहते नींद से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान दिया जाए, तो पार्किंसन रोग की गति को धीमा किया जा सकता है या उसके जोखिम को कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में पार्किंसन की रोकथाम और इलाज केवल दवाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अच्छी, नियमित और गहरी नींद को भी उपचार की अहम कड़ी माना जाएगा। अंततः यह कहा जा सकता है कि नींद केवल आराम का समय नहीं, बल्कि दिमाग की सुरक्षा का आधार है, और यदि पार्किंसन जैसी बीमारी से लड़ना है, तो उसकी शुरुआत शायद एक पूरी और गहरी रात की नींद से ही करनी होगी।