लैंगिक समानता, महिलाओं को आगे बढ़ाने और समावेशी समाज के निर्माण हेतु जरूरी हैं महिला अधिकार- डॉ. दिवाकर

Thu 29-Jan-2026,05:50 PM IST +05:30

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लैंगिक समानता, महिलाओं को आगे बढ़ाने और समावेशी समाज के निर्माण हेतु जरूरी हैं महिला अधिकार- डॉ. दिवाकर Women Rights Awareness
  • महिला अधिकार, पॉश एक्ट और बाल अधिकारों पर जागरूकता.

  • नशा मुक्त एवं बाल विवाह मुक्त भारत अभियान पर जोर.

  • राज्य की कल्याणकारी योजनाओं व मुफ्त विधिक सहायता की जानकारी.

Uttar Pradesh / Kaushambi District :

Kaushambi / आज दिनांक 28.01.2026 को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जनपद न्यायालय कौशाम्बी के तत्वावधान में ग्राम सैयद सरावां निमिया में चायल कौशाम्बी में मा. सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित निर्णयों का व्यापक प्रचार-प्रसार, नशा मुक्त एवं बाल विवाह मुक्त भारत अभियान, शोषण के विरूध अधिकार, पॉश एक्ट व बच्चो के अधिकार और राज्य की कल्याणकारी योजनाएं
विषय पर विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।
 
डॉ. नरेन्द्र दिवाकर ने महिला अधिकार पर बात करते हुए कहा कि महिला अधिकार वे मौलिक अधिकार हैं जो सभी महिलाओं और लड़कियों को जन्म से प्राप्त हैं, जैसे शिक्षा, समान वेतन, हिंसा से मुक्ति, उत्पीड़न और जबरन श्रम से मुक्त रहना और अपने शरीर के बारे में निर्णय लेने अर्थात प्रजनन का अधिकार, संपत्ति रखने का अधिकार, उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार और राजनीतिक भागीदारी का अधिकार आदि।

महिला अधिकार न केवल महिलाओं के लिए अपितु समाज में समानता लाने, उन्हें आगे बढ़ाने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए भी ज़रूरी हैं जिससे समावेशी समाज का निर्माण हो सके।

पॉश एक्ट पर बात करते हुए कहा कि, यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता की शिकायतों के लिए एक संरचित शिकायत निवारण तंत्र प्रदान कर कार्यस्थल पर समानता और समावेशिता को  बढ़ावा देता है जिससे महिला कर्मचारियों की भागीदारी और उत्पादकता भी बढ़े।

शोषण के विरूद्ध अधिकार और बाल अधिकार पर बात करते हुए कहा कि शोषण के विरुद्ध अधिकार किसी भी व्यक्ति को गुलामी और अमानवीय परिस्थितियों से बचाते हैं। शोषण के विरुद्ध अधिकार से जुड़े प्रावधान भारतीय संविधान (अनु. 23 और 24)  सहित कई कानूनों में दिए गए हैं।नागरिकों को मानव तस्करी, बेगार और जबरन श्रम से बचाता है। अनुच्छेद 23 मानव व्यापार और बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाता है, जबकि अनुच्छेद 24 चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक कारखानों में काम पर लगाने से रोकता है। 

अनैतिक व्यापार अधिनियम 1956, किशोर न्याय अधिनियम (2015), शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम (2009), बाल श्रम निषेध (संशोधन) अधिनियम (2016), और बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम आदि कानून शोषण से बचाते हैं।

मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना, कन्या सुमंगला योजना, वृद्धापेंशन और निराश्रित महिला पेंशन योजना, मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, दिव्यांग सहायता योजना, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा प्रदत्त सेवाओं आदि के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान करते हुए कहा कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण समाज के कमजोर और आर्थिक रूप से अक्षम वर्गों को मुफ्त  विधिक सहायता प्रदान करता है, ताकि समानता के आधार पर सबको न्याय मिले। समय-समय पर लोक अदालत का आयोजन, मध्यस्थता, विधिक साक्षरता और जागरूकता शिविरों का आयोजन करता है तथा जरूरतमंद पात्र व्यक्तियों को तहसील स्तर पर भी निःशुल्क अधिवक्ता प्रदान करता है, इसका उद्देश्य निर्धन और कमजोर वर्ग तक न्याय न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना है। बाल विवाह और नशा जैसी कुप्रथाएं हमारे समाज में व्याप्त गंभीर समस्याएं हैं, इनको दूर करने में ही समाज की भलाई है। 

शिविर में उपस्थित लोगों को नशा मुक्त भारत बनाने की शपथ भी दिलवाई गई। इस अवसर पर प्रधान असद हुसैन,आंगनवाड़ी कार्यकर्ती  श्रीमती पुष्पलता सोनकर, पैरा लीगल वालंटियर ज्योत्सना सोनकर, साहिल अहमद, अंजलि, आराध्या, संध्या, अयान सोनकर, साधना, अनीता, सुमन देवी, पिंटू, अनुभव सिंह, सनी, आफताब, अफसाना बानो सहित,  बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कौशाम्बी