भावुक इस्तीफ़े के पीछे की सच्चाई क्या, GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह पर फर्जी विकलांगता का गंभीर आरोप

Wed 28-Jan-2026,03:37 PM IST +05:30

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भावुक इस्तीफ़े के पीछे की सच्चाई क्या, GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह पर फर्जी विकलांगता का गंभीर आरोप Gst Deputy Commissioner Prashant Kumar Singh Case
  • फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र के आरोप.

  • जांच तेज होते ही दिया गया इस्तीफा.

  • सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल.

Uttar Pradesh / Lucknow :

Lucknow / उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लिए भावुक शब्दों के साथ इस्तीफ़ा देने वाले GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह अब खुद गंभीर सवालों के घेरे में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी सेवा हासिल की और जैसे ही इस मामले की जांच तेज़ हुई, उन्होंने नैतिकता और भावनात्मक कारणों का हवाला देकर इस्तीफ़ा देने का नाटकीय कदम उठा लिया। यह मामला अब सिर्फ एक अधिकारी के व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है।

इस प्रकरण में नया मोड़ तब आया जब प्रशांत कुमार सिंह के सगे बड़े भाई और जाने-माने चिकित्सक डॉ. विश्वजीत सिंह सार्वजनिक रूप से सामने आए। उन्होंने लाइव आकर दावा किया कि जिस बीमारी के आधार पर प्रशांत सिंह ने खुद को विकलांग बताया, वह बीमारी मेडिकल साइंस के अनुसार 50 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति में नहीं पाई जाती। डॉ. सिंह का कहना है कि यह न सिर्फ चिकित्सकीय रूप से संदिग्ध है, बल्कि पूरी कहानी को शक के दायरे में लाता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायत सामने आने के बाद गठित मेडिकल बोर्ड ने प्रशांत सिंह को कई बार परीक्षण के लिए बुलाया, लेकिन वे हर बार किसी न किसी बहाने से अनुपस्थित रहे। सवाल यह उठ रहा है कि अगर बीमारी वास्तविक और लाइलाज थी, तो मेडिकल जांच से बार-बार दूरी क्यों बनाई गई।

सूत्रों के अनुसार, इस मामले की जानकारी पहले ही स्वास्थ्य विभाग के उच्च स्तर तक पहुंच चुकी थी। मऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने 19 दिसंबर 2025 को महानिदेशक स्वास्थ्य को एक विस्तृत पत्र लिखकर पूरे प्रकरण से अवगत कराया था। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि जांच अंतिम चरण में है और मेडिकल परीक्षण बेहद ज़रूरी है। इसके बावजूद आरोपी अधिकारी का मेडिकल बोर्ड के सामने पेश न होना जांच को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि जैसे ही जांच निर्णायक मोड़ पर पहुंची, उसी समय इस्तीफ़ा देकर नैतिक ऊंचाई दिखाने की कोशिश की गई, ताकि कानूनी और विभागीय कार्रवाई से बचा जा सके।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां काग़ज़ों में अधिकारी गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित बताया जाता है, लेकिन व्यवहारिक जीवन और जिम्मेदारियों में वह पूरी तरह फिट नज़र आता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल नियमों के साथ धोखा होगा, बल्कि उन वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों के अधिकारों पर भी चोट होगी, जो ईमानदारी से आरक्षण और सहूलियत का लाभ पाने के हकदार हैं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले में निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई की मांग तेज़ कर दी है।

सरकारी तंत्र की साख इस समय कठघरे में खड़ी है। जनता के मन में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या भावुक इस्तीफ़ा वास्तव में नैतिक जिम्मेदारी का प्रतीक था, या फिर यह जांच से बचने की एक सोची-समझी रणनीति। अब निगाहें जांच एजेंसियों और शासन-प्रशासन पर टिकी हैं कि वे इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या दोषी पाए जाने पर उच्च पद और रसूख से ऊपर उठकर कार्रवाई की जाएगी। यह प्रकरण आने वाले समय में प्रशासनिक ईमानदारी की एक बड़ी कसौटी बनता दिख रहा है।