भारतीय नौसेना को मिली ‘मंगरोल’, 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री वाली एएसडब्ल्यू नौका
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ASW Shallow Water Craft
भारतीय नौसेना को तीसरी एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘मंगरोल’ मिली।
युद्धपोत में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है।
रडार, सोनार, टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी रॉकेट से लैस है।
New Delhi / भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को और मजबूती मिली है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), कोच्चि द्वारा निर्मित तीसरी उथले जल की पनडुब्बी रोधी युद्धक नौका (Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft) ‘मंगरोल’ को 21 अगस्त 2026 को भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया। यह सुपुर्दगी देश में स्वदेशी युद्धपोत निर्माण की बढ़ती क्षमता और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
‘मंगरोल’ में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इससे यह जहाज भारतीय रक्षा उद्योग और स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं की बढ़ती ताकत को प्रदर्शित करता है। जहाज को विशेष रूप से तटीय और उथले जलक्षेत्र में पनडुब्बियों की निगरानी तथा पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए तैयार किया गया है।
कई आधुनिक क्षमताओं से लैस
भारतीय नौसेना को सौंपे गए इस युद्धपोत में पानी के भीतर निगरानी की अत्याधुनिक क्षमता है। यह तटीय जलक्षेत्र में पनडुब्बी रोधी युद्धक अभियान (ASW) के साथ-साथ निम्न-तीव्रता वाले समुद्री अभियानों (LIMO) में भी उपयोगी होगा। इसके अलावा जहाज को समुद्री बारूदी सुरंगों से बचाव और सुरक्षित संचालन के लिए भी सक्षम बनाया गया है।
‘मंगरोल’ को वाटरजेट प्रणोदन प्रणाली से संचालित किया जाता है। इसमें आधुनिक टॉरपीडो, पनडुब्बी रोधी रॉकेट, उन्नत रडार और सोनार जैसी प्रणालियां मौजूद हैं। इन तकनीकों के जरिए जहाज समुद्र के भीतर मौजूद संदिग्ध गतिविधियों और पनडुब्बियों का पता लगाने में सक्षम होगा। विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों और अपेक्षाकृत कम गहराई वाले समुद्री इलाकों में इसकी उपयोगिता महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
गुजरात के तटीय शहर के नाम पर रखा गया नाम
इस युद्धपोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित तटीय शहर और छोटे बंदरगाह ‘मंगरोल’ के नाम पर रखा गया है। मंगरोल समुद्री मत्स्य पालन उद्योग से जुड़ा एक प्रमुख बंदरगाह है और गुजरात के समुद्री तट की महत्वपूर्ण पहचान रखता है।
‘मंगरोल’ नाम भारतीय नौसेना के पुराने युद्धपोत आईएनएस मंगरोल की विरासत से भी जुड़ा है। पूर्व माइनस्वीपर आईएनएस मंगरोल वर्ष 2004 तक भारतीय नौसेना की सेवा में रहा। नए युद्धपोत को यह नाम देकर नौसेना ने अपने पुराने युद्धपोतों की विरासत और विशिष्ट नामों को संरक्षित रखने की परंपरा को आगे बढ़ाया है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम कदम
‘मंगरोल’ की नौसेना में सुपुर्दगी भारत के स्वदेशी रक्षा निर्माण अभियान के लिए भी महत्वपूर्ण है। युद्धपोत में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि भारतीय जहाज निर्माण उद्योग आधुनिक रक्षा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इस तरह के स्वदेशी युद्धपोत न केवल भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता बढ़ाते हैं, बल्कि देश में रक्षा विनिर्माण, अनुसंधान और तकनीकी विशेषज्ञता को भी मजबूत करते हैं। तटीय सुरक्षा, समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए ‘मंगरोल’ भारतीय नौसेना के बेड़े में एक महत्वपूर्ण क्षमता जोड़ेगा।
‘मंगरोल’ की सुपुर्दगी आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप स्वदेशी रक्षा उत्पादन की दिशा में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह उपलब्धि भारत की बढ़ती समुद्री शक्ति और घरेलू रक्षा विनिर्माण क्षमता को भी रेखांकित करती है।