ईरान-इजरायल जंग का 9वां दिन: सॉलिड फ्यूल मिसाइल से हमला, क्या है ये खतरनाक तकनीक?
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Solid Fuel Missile
ईरान ने ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-4 के तहत इजरायल पर नई मिसाइलों से हमला किया।
सॉलिड फ्यूल मिसाइलें तेज गति और तुरंत लॉन्च क्षमता के लिए जानी जाती हैं।
इजरायल ने ईरान के तेल भंडार और फ्यूल टैंकों को निशाना बनाया।
Iran / मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध लगातार और गंभीर होता जा रहा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के बीच जंग का आज नौवां दिन है, लेकिन हालात में किसी तरह की शांति की उम्मीद फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है। तीनों पक्षों के बीच लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले हो रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया है।
ईरान ने हाल के दिनों में इजरायल और अमेरिका के हमलों का जवाब तेज कर दिया है। इसी कड़ी में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने “ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-4” के तहत हमलों की 27वीं लहर शुरू कर दी है। इस अभियान के दौरान ईरान के एयरोस्पेस डिवीजन ने इजरायल के उत्तरी इलाकों को निशाना बनाते हुए नए “खैबर-शेकन” सॉलिड फ्यूल मिसाइलों का इस्तेमाल किया है। इन मिसाइलों के इस्तेमाल से युद्ध की तीव्रता और बढ़ गई है।
ईरान द्वारा सॉलिड फ्यूल तकनीक वाली मिसाइलों के इस्तेमाल के बाद दुनिया भर में इस तकनीक को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दरअसल सॉलिड फ्यूल यानी ठोस ईंधन से चलने वाली मिसाइलें युद्ध में बेहद खतरनाक मानी जाती हैं। इन मिसाइलों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इन्हें लॉन्च करने से ठीक पहले ईंधन भरने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल के भीतर पहले से ही ठोस ईंधन भरा होता है, जिससे इसे किसी भी समय तुरंत दागा जा सकता है।
यही वजह है कि युद्ध की स्थिति में सॉलिड फ्यूल मिसाइलें ज्यादा प्रभावी मानी जाती हैं। इनकी स्पीड बहुत तेज होती है और इन्हें पकड़ना या इंटरसेप्ट करना भी मुश्किल होता है। इसके अलावा इन मिसाइलों को लंबे समय तक स्टोर करना आसान होता है और इन्हें संभालने में भी ज्यादा जटिलता नहीं होती।
सॉलिड फ्यूल मिसाइलों का एक और बड़ा फायदा यह है कि इन्हें लॉन्च करने में बहुत कम समय लगता है। कई बार ये कुछ ही मिनटों में तैयार होकर दागी जा सकती हैं। ठोस ईंधन के कारण ये मिसाइलें ज्यादा पेलोड यानी भारी हथियार भी ले जाने में सक्षम होती हैं। यही कारण है कि लंबी दूरी तक हमले के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है।
इतिहास की बात करें तो सॉलिड फ्यूल मिसाइल तकनीक का इस्तेमाल पहली बार 1970 के दशक में सोवियत संघ ने किया था। इसके बाद फ्रांस ने भी इसी तकनीक के आधार पर मध्यम दूरी की मारक क्षमता वाली एस-3 यानी SSBS मिसाइल प्रणाली विकसित की। बाद में चीन ने भी 1990 के दशक में इस तकनीक का परीक्षण किया। आज के समय में उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों के पास भी यह तकनीक मौजूद है और वे इसे सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
इस बीच इजरायल ने भी ईरान के खिलाफ अपने हमले तेज कर दिए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इजरायल ने ईरान के तेल भंडार और ईंधन से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया है। इजरायली मीडिया के अनुसार ईरान के लगभग 30 फ्यूल टैंकों और कई तेल डिपो पर हमले किए गए हैं। इन हमलों का मकसद ईरान की ऊर्जा आपूर्ति और सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना बताया जा रहा है।
अमेरिका की ओर से भी सख्त बयान सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह हार मान ले। उनके अनुसार या तो ईरान खुद आत्मसमर्पण करे या फिर उसकी सैन्य ताकत को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह लड़ाई जारी रखने की स्थिति में ही न रहे।
हालांकि ईरान ने भी कड़ा रुख अपनाया है। ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी जहाज फारस की खाड़ी में प्रवेश करते हैं तो उन्हें समुद्र में डुबो दिया जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए अपनी नौसेना को फारस की खाड़ी में भेज सकता है। ये टैंकर आमतौर पर रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं।
इस युद्ध के कारण भारी नुकसान भी हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक ईरान में अब तक 6,668 नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया है। इन हमलों में 5,535 घर और 1,041 दुकानें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। इसके अलावा 14 मेडिकल सेंटर और 65 स्कूल भी हमलों की चपेट में आए हैं। रेड क्रिसेंट के 13 केंद्रों को भी नुकसान पहुंचा है।
अब तक इस संघर्ष में कुल 1,483 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इजरायल में 1,765 लोग घायल बताए जा रहे हैं। लगातार बढ़ते हमलों और कड़े बयानों के बीच मिडिल ईस्ट में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं और दुनिया की नजरें इस संघर्ष के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।