अनुच्छेद 21 की नई व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु को माना जीवन के अधिकार का हिस्सा
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Article 21 Right to Life India
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार माना.
हरीश राणा मामले में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति.
फैसले से इच्छामृत्यु और मानवाधिकारों पर नई बहस.
Delhi / सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति देते हुए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला “जीवन का अधिकार” केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने और गरिमा के साथ मृत्यु प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने अपने निर्णय की शुरुआत 19वीं सदी के अमेरिकी समाजसुधारक हेनरी वॉर्ड बीचर के एक प्रसिद्ध कथन से की। अदालत ने लिखा कि “ईश्वर किसी से यह नहीं पूछता कि वह जीवन स्वीकार करेगा या नहीं, यह चुनाव नहीं है; लेकिन एकमात्र चुनाव यह है कि आप इसे कैसे स्वीकार करते हैं।” अदालत ने इस विचार को मानव जीवन की गरिमा से जोड़ते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अत्यधिक पीड़ा, असहायता और अपमानजनक स्थिति में जीवन बिताने के लिए बाध्य करना संविधान की मूल भावना के विपरीत हो सकता है। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि अदालत ने इस संवेदनशील प्रश्न पर विचार करते हुए यह समझने की कोशिश की कि क्या किसी व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों में मृत्यु को चुनने की स्वतंत्रता मिल सकती है, जब जीवन केवल असहनीय पीड़ा और निर्भरता का पर्याय बन जाए। न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में इंग्लैंड के प्रसिद्ध नाटककार विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध वाक्य “होना या न होना” का भी उल्लेख किया और बताया कि यह दार्शनिक प्रश्न मानव अस्तित्व, स्वतंत्रता और मृत्यु के अधिकार पर सदियों से चल रही बहस का प्रतीक रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में विशेष रूप से अनुच्छेद 21 की संवैधानिक व्याख्या पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत जीवन का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सम्मान, गरिमा और पीड़ा से मुक्ति के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने अपने फैसले में ‘ज्ञान कौर बनाम स्टेट ऑफ पंजाब’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि जीवन का अधिकार मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है और इसी सिद्धांत के भीतर गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी समाहित है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति की स्थिति ऐसी हो जाती है कि वह लंबे समय तक असहनीय शारीरिक कष्ट, पूरी तरह निर्भर जीवन और चिकित्सा के बावजूद सुधार की कोई संभावना न होने की स्थिति में हो, तब गरिमा के साथ मृत्यु की अनुमति देना मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से विचारणीय हो जाता है। हरीश राणा के मामले में भी अदालत ने सभी चिकित्सीय रिपोर्टों, मेडिकल बोर्ड की राय और परिवार की याचिका पर गंभीरता से विचार किया। करीब एक दशक से अधिक समय से गंभीर शारीरिक स्थिति में रह रहे राणा की हालत को देखते हुए अदालत ने माना कि उनकी गरिमा और मानवीय सम्मान की रक्षा सर्वोपरि है। फैसले में कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन की रक्षा ही नहीं करता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति का जीवन और मृत्यु दोनों गरिमा के साथ हों। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु और मानवाधिकारों से जुड़े विमर्श को एक नया आयाम देता है और यह स्पष्ट करता है कि भारतीय न्यायपालिका जीवन की गुणवत्ता, मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को समान रूप से महत्व देती है।