राष्ट्रपति मुर्मु से IFS प्रशिक्षु अधिकारियों की मुलाकात, राजनय में राष्ट्रहित सर्वोपरि

Thu 27-Aug-2026,11:55 PM IST +05:30

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राष्ट्रपति मुर्मु से IFS प्रशिक्षु अधिकारियों की मुलाकात, राजनय में राष्ट्रहित सर्वोपरि Indian Foreign Service
  • राष्ट्रपति मुर्मु ने प्रशिक्षु IFS अधिकारियों को राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की सलाह दी।

  • भारत की आर्थिक प्रगति के साथ नए राजनयिक और वैश्विक अवसर तलाशने पर जोर दिया।

  • तकनीक के साथ मानवीय संवेदनशीलता, ईमानदारी और प्रवासी भारतीयों से जुड़ाव को महत्वपूर्ण बताया।

Delhi / New Delhi :

New Delhi / भारतीय विदेश सेवा (IFS) के 2025 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों और भूटान के दो राजनयिकों ने गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात की। ये सभी अधिकारी वर्तमान में सुषमा स्वराज विदेश सेवा संस्थान में अपना प्रवेश प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को शुभकामनाएं देते हुए भारतीय कूटनीति की बदलती भूमिका और उनकी जिम्मेदारियों पर विस्तार से बात की।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने और राष्ट्रीय हितों के लिए काम करने का महत्वपूर्ण दायित्व मिलता है। उनके ऊपर विश्व के अलग-अलग देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी होती है। उन्होंने कहा कि भारत की तेजी से बढ़ती आर्थिक क्षमता ने दुनिया के साथ देश के जुड़ाव के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।

आर्थिक अवसरों को पहचानने की जरूरत
राष्ट्रपति ने प्रशिक्षु राजनयिकों से कहा कि वे निवेश, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और नवाचार जैसे क्षेत्रों में उभरते अवसरों पर लगातार नजर रखें। ऐसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझेदारियां विकसित की जानी चाहिए, जिनसे भारत के राष्ट्रीय हितों को मजबूती मिले। उन्होंने कहा कि राजनय केवल राजनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति और समृद्धि में भी उसका प्रत्यक्ष योगदान दिखाई देना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की वैश्विक सहभागिता हमेशा देशवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए और राष्ट्रहित सर्वोपरि रहना चाहिए। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए कूटनीति की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़ें राजनयिक
राष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को सलाह दी कि विदेशों में उनकी सहभागिता केवल सरकारी कार्यालयों और आधिकारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें विश्वविद्यालयों, कारोबारी जगत, शोध संस्थानों, नवप्रवर्तकों, सांस्कृतिक संगठनों, सिविल सोसायटी और स्थानीय समुदायों के साथ भी संवाद बढ़ाना चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ मजबूत और सार्थक संबंध बनाने पर जोर दिया। राष्ट्रपति ने कहा कि युवा प्रवासी भारतीयों को भारत से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और ऐसे अवसर तलाशे जाने चाहिए, जिनके जरिए वे भारत की विकास यात्रा में अपना योगदान दे सकें।

तकनीक के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी जरूरी
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि कूटनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। प्रौद्योगिकी ने देशों के बीच संवाद, कारोबार और नागरिक सेवाओं के तौर-तरीकों को बदल दिया है। इसलिए विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों को भी तकनीकी बदलावों के साथ आगे बढ़ना होगा।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीक को केवल संचार के साधन के रूप में नहीं, बल्कि सुशासन और व्यापक जनभागीदारी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके बावजूद तकनीक कभी भी मानवीय संवेदनशीलता की जगह नहीं ले सकती।

उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि विदेशों में भारतीय मिशनों के दरवाजे जरूरत के समय भारतीय नागरिकों के लिए हमेशा खुले और सुलभ रहने चाहिए। संकट में फंसे भारतीयों की सहायता करना विदेश सेवा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने हाल के वर्षों में भारत द्वारा चलाए गए बड़े बचाव और मानवीय सहायता अभियानों की परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को आगे बढ़ाएं
राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी केवल भारत सरकार का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे हजारों वर्षों की सभ्यतागत विरासत वाले देश के प्रतिनिधि हैं। साथ ही वे एक युवा, गतिशील और आकांक्षी भारत की छवि भी दुनिया के सामने रखते हैं।

उन्होंने कहा कि शांति, बहुलतावाद, संवाद, सह-अस्तित्व और विविधता के प्रति सम्मान भारत के सभ्यतागत मूल्यों में गहराई से निहित हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना भारतीय राजनय की महत्वपूर्ण आधारशिला है।

राष्ट्रपति ने प्रशिक्षु राजनयिकों से बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच सजग, जिज्ञासु और निरंतर सीखने के लिए तैयार रहने को कहा। उन्होंने विशेष रूप से विनम्रता को महत्वपूर्ण गुण बताया।

उन्होंने कहा कि विदेश यात्रा और नियुक्ति के दौरान अधिकारियों को हमेशा याद रखना चाहिए कि वे केवल भारत सरकार का नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों और उनकी आशाओं-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। राष्ट्रपति ने सभी प्रशिक्षु अधिकारियों को ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पेशेवर आचरण के उच्चतम मानदंड बनाए रखने की सलाह दी।