झोड़िया जनजाति को एसटी दर्जा देने पर अटका प्रस्ताव

Thu 05-Feb-2026,06:35 PM IST +05:30

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झोड़िया जनजाति को एसटी दर्जा देने पर अटका प्रस्ताव Jhodia-Tribe-ST-Status-Odisha-Proposal-Update
  • झोड़िया समुदाय को एसटी सूची में शामिल करने के प्रस्ताव को ORGI ने अस्वीकार किया, मामला पुनः ओडिशा सरकार को भेजा गया

  • सौरा भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग, लेकिन अब तक कोई निश्चित राष्ट्रीय मानदंड तय नहीं

Odisha / Bhubaneshwar :

Odisha/ ओडिशा के जनजातीय समुदायों से जुड़े एक अहम मुद्दे पर केंद्र सरकार ने लोकसभा में स्थिति स्पष्ट की है। जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने बताया कि ओडिशा सरकार द्वारा झोड़िया समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में परोजा के पर्याय के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा गया था। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर भारत के रजिस्ट्रार जनरल (ORGI) ने सहमति नहीं जताई है, जिसके चलते मामला फिलहाल आगे नहीं बढ़ सका है।

राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने लोकसभा को जानकारी दी कि ओडिशा सरकार से प्राप्त प्रस्ताव में झोड़िया समुदाय को अनुसूचित जनजातियों की सूची में क्रमांक 55 पर शामिल करने का अनुरोध किया गया था। यह प्रस्ताव परोजा जनजाति के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन इसकी नृवंशविज्ञान रिपोर्ट और अन्य तथ्यों की जांच के बाद ORGI ने इसे समर्थन नहीं दिया।

सरकारी प्रक्रिया के अनुसार, किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने से पहले राज्य सरकार को विस्तृत नृवंशविज्ञान अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है। इसके बाद प्रस्ताव की जांच पहले रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI/ORGI) और फिर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) द्वारा की जाती है। यदि ORGI आपत्ति दर्ज करता है, तो प्रस्ताव को आवश्यक सुधारों और अतिरिक्त जानकारी के लिए राज्य सरकार को वापस भेज दिया जाता है।

मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि कई बार ऐसे प्रस्ताव विभिन्न स्तरों पर लंबे समय तक जांच के अधीन रहते हैं, जिससे निर्णय में समय लग सकता है।

भाषा से जुड़ा मुद्दा

इसके साथ ही, सौरा (सोरा) भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का भी उल्लेख किया गया। सरकार ने बताया कि अब तक आठवीं अनुसूची में नई भाषाओं को शामिल करने के लिए कोई निश्चित मानदंड तय नहीं किए जा सके हैं। पाहवा समिति (1996) और सीताकांत मोहपात्रा समिति (2003) द्वारा इस दिशा में प्रयास किए गए, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। सरकार ने कहा कि वह भाषाई विविधता से जुड़ी भावनाओं से अवगत है और सभी प्रासंगिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य में ऐसे अनुरोधों पर विचार किया जाएगा।