जहां नाली, वहीं बोरिंग… आखिर कैसी इंजीनियरिंग? निगम के निर्माण पर सवाल, दूषित हो सकता है भूजल
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Nagar Nigam Jabalpur News
नाली के बीच बोरिंग मिलने से नगर निगम पर सवाल।
जमीन के स्वामित्व और सीमांकन को लेकर विवाद।
भूजल सुरक्षा के लिए तकनीकी जांच जरूरी।
Jabalpur / नगर निगम के वार्ड क्रमांक 72 दादा ठनठन पाल वार्ड की मानस विहार कॉलोनी में नाली निर्माण को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने नगर निगम के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कॉलोनी की गली नंबर-3 में एक मकान के सामने बनाई गई नाली के बीचों-बीच बोरिंग का हिस्सा सामने आ गया है। जिसने बोरिंग कराई थी वह नाली वाली जगह पर अपना स्वामित्व जता रहा हैं.
मौके की तस्वीरों में नाली के लिए की गई खुदाई के बीच लोहे के सरिए और निर्माण कार्य दिखाई दे रहे हैं। इसी हिस्से में एक आयताकार गड्ढा खुला है, जिसके भीतर बोरिंग से संबंधित पाइप एवं अन्य सामग्री दिखाई दे रही है। इसके बाद भी नगर निगम द्वारा नाली निर्माण कर दिया गया, फिर नाली, गली के नागरिक द्वारा चीप से सीमेंटेट कर दिया.
बिल्डर का दावा—मेरी जमीन पर जबरन बनाई नाली
मामले में संबंधित इंजीनियर और बिल्डर संजय विश्वकर्मा का कहना है कि नाली का निर्माण उनकी जगह पर जबरदस्ती किया गया है। उनका दावा है कि बोरिंग सही स्थान पर है और निर्माण के लिए उनकी भूमि का इस्तेमाल किया गया है।
वहीं, पीड़ित स्थानीय रहवासी मनमोहन कुशवाहा ‘गट्टू का कहना है कि क्षेत्रीय पार्षद अर्चना सिसोदिया की अनुशंसा पर पार्षद मद से नाली का निर्माण कराया गया है। वह स्वयं निर्माण कार्य के वक्त निरीक्षण करने पहुंची थी. बोरिंग संबंधी शिकायत पार्षद को भी की और सीएम हेल्प लाइन में भी कम्प्लेन दर्ज कराई. हालाँकि अभी बोर से पम्प तो निकाल दिया लेकिन आगे पानी की शुद्धता को कौन देखेगा?
नाली का पानी बोर में पहुंचा तो क्या होगा?
जानकारों के अनुसार, यदि भविष्य में बोरिंग का मुंह नाली के भीतर या उसके संपर्क में खुला रहता है तो बारिश और निस्तार का गंदा पानी उसमें प्रवेश करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में बोरिंग के भूजल के दूषित होने का खतरा पैदा हो सकता है। यदि इस बोरिंग के पानी का इस्तेमाल घरेलू अथवा अन्य उपयोग के लिए किया जाता है तो यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम बन सकता है।
विशेषज्ञों की राय में बोरिंग के आसपास उचित सीलिंग और सुरक्षा व्यवस्था जरूरी होती है, ताकि सतही गंदा पानी सीधे भूजल स्रोत तक न पहुंच सके। ऐसे में इस निर्माण की तकनीकी जांच होना जरूरी दिखाई देता है।
उधर क्षेत्रीय पार्षद अर्चना सिसोदिया ने अब इस पूरे गड़बडझाले का ठीकरा निगम अधिकारियों और कर्मचारियों पर फोड़ रही हैं. उनका कहना है कि ये सब जिम्मेदारी संबंधित विभाग की है.
नगर निगम के सामने दो बड़े सवाल
इस पूरे मामले में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर दो अहम सवाल खड़े होते हैं—
पहला, यदि बोरिंग वास्तव में संबंधित बिल्डर की भूमि पर मौजूद थी, तो नाली निर्माण से पहले स्थल का सीमांकन और निरीक्षण क्यों नहीं किया गया? पार्षद की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते है.
दूसरा, यदि नाली का निर्माण नगर निगम की भूमि अथवा नियमानुसार किया गया है, तो नाली के बीच मौजूद बोरिंग का निर्माण करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? को इस तरह खुला क्यों छोड़ा गया और उसके पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए?
जांच के बाद ही सामने आएगी वास्तविकता
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि नाली निर्माण के दौरान बोरिंग की स्थिति को लेकर नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई तकनीकी निरीक्षण किया था या नहीं। भूमि की वास्तविक स्थिति, नाली की स्वीकृत ड्राइंग, सीमांकन और बोरिंग के स्वामित्व की जांच के बाद ही पूरे मामले की वास्तविकता सामने आ सकेगी।
लेकिन इतना जरूर है कि नाली के बीच बोरिंग और उसे खुला छोड़ दिया जाना केवल निर्माण संबंधी विवाद नहीं, बल्कि जलनिकासी और भूजल की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। नगर निगम को मामले की निष्पक्ष तकनीकी जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि निर्माण किस नियम और स्वीकृत योजना के तहत किया गया तथा बोरिंग को सुरक्षित रखने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
अब देखना यह है कि नगर निगम इस मामले को महज निर्माण विवाद मानकर छोड़ता है या मौके की जांच कर नाली, बोरिंग और भूमि की वास्तविक स्थिति सामने लाते हुए जिम्मेदारी तय करता है।