राणा पूंजा भील बने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा की विजय के सूत्रधार
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Rana Punja Bhil
हल्दीघाटी युद्ध में राणा पूंजा भील की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
मेवाड़ राज्य और भील समाज के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख।
जनजातीय वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्ररक्षा में भील समाज के योगदान पर प्रकाश।
Jabalpur / हल्दीघाटी का महान युद्ध हिंदुओं के एकत्व की विजय का प्रतीक है, जिसमें महाराणा प्रताप के नेतृत्व में समाज के सभी वर्गों ने भाग लिया था, परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मिशनरियों वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलरों ने विभेद उत्पन्न कर हिंदू समाज में वर्ग संघर्ष के लिए मुहिम छेड़ रखी है, जिसके उन्मूलन के लिए हल्दीघाटी का युद्ध राम बाण है। जनजातीय संदर्भ में तो मील का पत्थर है,क्योंकि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय के सूत्रधार राणा पूंजा भील ही बने थे। इसलिए पूंजा भील को राणा की सर्वोच्च उपाधि मिली थी। सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है,कि मेवाड़ के राज्य चिन्ह (स्टेट, कोट-ऑफ-आर्म्स, state, coat-of-arms ) में बाईं ओर प्रतीकात्मक राणा पूंजा भील (भील योद्धा ) और दाईं ओर प्रतीकात्मक महाराणा प्रताप ( राजपूत योद्धा) अंकित है। यह राज्य चिन्ह हिंदुओं के विरुद्ध जनजातियों को लेकर रचे गए नकारात्मक मत प्रवाह को स्वमेव ध्वस्त कर देता है। राज्य चिन्ह में आदर्श वाक्य के रूप में अंकित है कि
"जो दृढ़ राखे धर्म को,तिही राखे करतार।"
भारत के गौरवशाली इतिहास की परंपरा में भील जनजाति का अद्भुत और अद्वितीय माहात्म्य रहा है। ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों के आलोक में सतयुग में महादेव - बड़ा देव के पुत्र निषाद, जो तीर कमान विद्या में निपुण थे, भील जनजाति के आदि पुरुष के रूप में शिरोधार्य हैं। त्रेता में भगवान श्री राम के साथ निषादराज गुह और द्वापर युग में धनुर्धर अर्जुन की परीक्षा के लिए महादेव किरात भील के रूप में अवतरित हुए थे, वहीं वर्तमान युग के हर कालखंड में हुए स्वातंत्र्यसमर में भील जनजाति का अति विशिष्ट योगदान रहा है। प्राचीन काल में सिकंदर को शिवी जनपद के भीलों ने पराजित किया था, मध्यकाल में महाराणा प्रताप के साथ राणा पूंजा भील ने अकबर के विरुद्ध भयंकर संग्राम किया था और मेवाड़ से खदेड़ दिया था। इसी महान् परंपरा के अनुक्रम में आधुनिक भारत में महा महारथी टंट्या भील ने अंग्रेजी शासन को ध्वस्त करने के लिए 12 वर्ष तक लगातार 24 युद्ध लड़े और अपराजेय रहे, उन्हें सुनियोजित षड्यंत्र कर ही गिरफ्तार किया गया था।
देखा जाए तो मेवाड़ राज्य की स्थापना में भीलों का महती योगदान रहा है। इतिहास में बप्पा रावल (मेवाड़ राज्य के संस्थापक) और भील जनजाति का संबंध बहुत पुराना और गहरा है। यह रिश्ता केवल एक राजा और प्रजा का नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और भाईचारे का था। जब बप्पा रावल छोटे थे, तब भील समुदाय के लोगों ने उन्हें और उनकी माता को छिपाकर पाला था। भीलों ने उनकी जान बचाई थी।भील सरदारों ने ही बप्पा रावल को अपना राजा माना और उन्हें 'रावल' की उपाधि (पद) दी थी।अरबों के विरुद्ध युद्ध में भी लोहा लिया,जब 8वीं सदी में अरब आक्रमणकारियों (जैसे जुनैद) ने भारत पर हमले किए, तब भील वीरों ने बप्पा रावल की सेना में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी। बप्पा रावल की महान् तलवार "खण्डा" भीलों ने ही बनाई थी। इसलिए हल्दीघाटी के युद्ध के पूर्व महाराणा प्रताप ने वीर शिरोमणि बप्पा रावल की पवित्र तलवार को साक्षी मानकर पूंजा भील से गठबंधन किया था, जिसका आशय था,कि दोनों मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए जीवन का बलिदान देने को तैयार हैं।
राणा पूंजा भील (भीलू राणा) का जन्म 16वीं सदी में राजस्थान के मेरपुर नामक स्थान पर हुआ था, इनके पिता का नाम दूदा होलंकी और माता का नाम केहरी बाई था। केवल 15 वर्ष की कम उम्र में पिता की मृत्यु के बाद, वे मेरपुर के मुखिया बने। अपनी योग्यता के कारण वे शीघ्र ही 'भोमट के राजा' के रूप में प्रसिद्ध हो गए।सन् 1576 में महाराणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध भील समाज से सहयोग मांगा तब राणा पूंजा ने सभी भील सरदारों को संगठित किया और एक बड़ी भील सेना के साथ महाराणा का समर्थन किया। भील सैनिकों ने मिलकर गुरिल्ला युद्ध (छुपकर वार करने की रणनीति) का प्रयोग किया था। इससे मुगल सेना भ्रमित हो गई और हल्दीघाटी से भाग निकली थी।
भगवान् एक लिंग नाथ के दीवान महा महारथी राणा कीका (महाराणा प्रताप)और राणा पुंजा (पूंजा) भील, हिन्दू धर्म ध्वज रक्षक, हिंदुत्व के सूर्य, भारतीय स्वतंत्रता, स्वाभिमान और शौर्य के प्रतीक के रुप शिरोधार्य हैं। महाराणा प्रताप मुगलों के लिए यमराज की भाँति थे, वहीं राणा पुंजा भील ने अकबर के लालच भरे प्रस्ताव को ठुकरा कर यमदूत का रुप ले लिया था। इसलिए दोनों, धूर्त और लंपट अकबर के लिए भय का पर्याय बन गए थे। इतिहास गवाह है कि भयाक्रांत धूर्त अकबर कभी युद्ध के लिए राणा कीका के सामने नहीं आया।
अकबर ने इस्लामिक स्टेट की अवधारणा को लेकर संपूर्ण भारत में कहर बरपा दिया था और इसी संदर्भ में महाराणा प्रताप के पास 4 बार मैत्रीपूर्ण संधि करने के लिए अकबर ने विभिन्न राजदूत मंडल भेजें, परंतु महाराणा प्रताप, अकबर के कुचक्र को समझते थे इसलिए अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता और अस्मिता के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते थे।
वहीं दूसरी ओर भोमट क्षेत्र पानरवा के भील राजा भील वंश के गौरव महारथी राणा पूंजा को अनेक बार धूर्त अकबर ने प्रकारांतर मिलाने के अथक प्रयास किए परंतु सब व्यर्थ गए। उल्लेखनीय है, कि जब - जब भारतवर्ष के स्व पर आंच आई है तब - तब जनजातियों ने सर्वस्व अर्पित किया है, जिसका अनूठा दृष्टांत हल्दीघाटी का युद्ध है।
अकबर जब राणा पुंजा भील को नहीं मिला सका तब उसने राणा पुंजा को युद्ध से पृथक रहने के लिए धमकाया, परंतु कोई लाभ न हुआ। अतः युद्ध होना अवश्यंभावी हो गया था।
रणनीति के अनुसार राणा पूंजा भील ने हल्दीघाटी के युद्ध के एक दिन पूर्व 17 जून को ही अरावली पर लामबंदी कर ली थी ताकि मुगलों पर घात लगा कर हमला किया जा सके।
हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की युद्ध व्यूह रचना के अनुसार सेना के हरावल (अग्रिम दस्ता ) का उत्तरदायित्व हकीम सूर और राजा रामशाह को सौंपा गया, जबकि चंदावल (पश्च दस्ता ) का उत्तरदायित्व राणा पूंजा भील को मिला। भील सैनिकों को पहाड़ों और जंगलों की गहरी जानकारी थी इसलिए वे गुरिल्ला युद्ध नीति ( छापामार युद्ध ) के विशेषज्ञ थे।
18 जून सन् 1576 को प्रातः 8 बजे हल्दीघाटी में भयंकर मोर्चा खुल गया। महाराणा प्रताप अग्रिम दस्ते ने हकीम सूर के निर्देशन में और दूसरी ओर दक्षिण पक्ष के नायक राजा रामशाह ने मुगलों पर भयानक हमला किया। मुगल सेना को खमनौर तक जमकर खदेड़ा, मुगल और कछवाहा राजपूत सैनिक भेड़ों की झुंड की भांति भाग निकले।
मुगल सेनानायक गाजी खां मुल्ला चिल्लाता हुआ भागा कि, "घोर आपत्ति के समय भाग जाना मोहम्मद साहब की उक्तियों में से एक है" महाराणा के प्रथम आक्रमण के तीव्र वेग से ही मुगलों की पीठें मुड़ गईं।
युद्ध भयानक हो उठा था। पुन:शहजादा सलीम, मान सिंह, सैय्यद बारहा और आसफ खान ने मोर्चा संभाला। शहजादा सलीम और मान सिंह की रक्षार्थ 20 हाथियों ने घेराबंदी कर रखी थी। घेराबंदी तोड़ने के लिए राणा प्रताप ने रामप्रसाद को आगे बढ़ाया अपरान्ह लगभग 12.30 बजे हाथियों का घमासान युद्ध हुआ। शस्त्रों से सुसज्जित रामप्रसाद ने भयंकर रौद्र रुप धारण किया अकबर के 13 हाथियों को अकेले रामप्रसाद ने मार डाला और 7 हाथियों को मोर्चे से हटा दिया गया। इस तरह राणा प्रताप के लिए रामप्रसाद ने शहजादा सलीम और मानसिंह तक पहुंचने का मार्ग खोल दिया।
महाराणा प्रताप ने शहजादा सलीम पर भयंकर आक्रमण किया, महावत मारा गया और हौदे पर जबरदस्त भाले का प्रहार किया, शहजादा सलीम नीचे गिर गया जिसे बचाने मान सिंह आया परिणाम स्वरूप मान सिंह की भी वही दुर्गति हुई। शहजादा सलीम और मान सिंह युद्ध भूमि से पलायन कर गए।
सैय्यद बारहा और आसफ खां पर राणा पूंजा भील ने घात लगाकर हमला किया फलस्वरूप मुगल सेना हल्दीघाटी से पलायन कर गई और महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी का युद्ध जीत लिया।
कतिपय इतिहासकारों का मत है, कि जून की भीषण गर्मी थी और हल्दीघाटी की धूल धीरे-धीरे तपने लगी, इसलिए मुगलों की हालत खराब होने लगी थी क्योंकि ऐंसी परिस्थितियों में मुग़ल लड़ने के लिए अभ्यस्त नहीं थे।अपरान्ह 12 बजे के बाद "मुगल सैनिकों की खोपड़ी में दिमाग तक उबलने लगा और हवा भट्टी की तरह हो गई थी, तथा सैनिकों में हिलने की शक्ति तक नहीं रह गई थी।" इसलिए मुग़ल सैनिक पलायन करने की स्थिति में थे और जब पुंजा भील ने घात लगाकर हमला किया तो मुग़ल सेना भाग निकली। इसलिए हल्दीघाटी में विजयश्री राणा प्रताप को ही मिली।
राणा पूंजा भील और उसके सैनिकों ने पलायन करती हुई, मुगल सेना पर भी घात लगाकर भीषण हमला किया। मुगल सेना भयाक्रांत हो गई थी। अब्दुल कादिर बदायूँनी लिखता है कि मुग़ल सेना, हल्दीघाटी से पलायन कर गोगुन्दा पहुँच गई और दूसरे दिन तक भयाक्रांत रही और प्रताप के "रात्रि आक्रमण से सुरक्षा के लिए, वहां सब गलियों में आड़ करवा दी गई और समूचे गोगुंदा कस्बे के चारों ओर खाई खुदवाकर इतनी ऊंची दीवाल बनवा दी, कि उसके ऊपर से कूदकर घोड़ा उसे फांद नहीं सके। तत्पश्चात ही मुग़ल सेनानायक निश्चिन्त हुए।" यह इस बात का प्रमाण है कि हल्दीघाटी की युद्ध में महाराणा प्रताप की ही विजय हुई थी और सूत्रधार राणा पूंजा भील बने।
डॉ.आनंद सिंह राणा,
इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत