मोदी-ली वार्ता: होर्मुज तनाव के बीच रणनीतिक साझेदारी पर फोकस
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South Korean President Lee Jae-Myung Arrives in New Delhi
होर्मुज संकट और वैश्विक ऊर्जा जोखिमों के बीच दोनों देशों की साझेदारी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है।
राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की भारत यात्रा इंडो-पैसिफिक रणनीति और ग्लोबल साउथ सहयोग को मजबूत करने के साथ तकनीकी और औद्योगिक विकास को नई गति देगी।
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच शिखर वार्ता में रक्षा, AI, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला सहयोग पर फोकस, वैश्विक अस्थिरता के बीच रणनीतिक महत्व बढ़ा।
नई दिल्ली/ एशिया और वैश्विक राजनीति के संवेदनशील दौर में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति Lee Jae-myung रविवार, 19 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली पहुंचे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi के निमंत्रण पर तीन दिवसीय राजकीय यात्रा की शुरुआत की। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव, विशेषकर होर्मुज क्षेत्र से जुड़े घटनाक्रम, वैश्विक ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
आठ वर्षों बाद ऐतिहासिक यात्रा
राष्ट्रपति ली की यह यात्रा कई मायनों में अहम मानी जा रही है। पिछले आठ वर्षों में किसी दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति की यह पहली भारत यात्रा है, और जून 2025 में पदभार संभालने के बाद उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा भी है। उनके साथ प्रथम महिला किम हे क्यूंग, वरिष्ठ मंत्री, अधिकारी और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है।
शिखर वार्ता में किन मुद्दों पर होगी चर्चा
20 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ली के बीच औपचारिक शिखर वार्ता होगी। इस बैठक में जहाज़ निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा सहयोग, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में, जहां आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो रही हैं और ऊर्जा मार्गों पर जोखिम बढ़ रहा है, भारत और दक्षिण कोरिया का सहयोग नई दिशा तय कर सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा सुरक्षा भी चर्चा का अहम विषय बन सकता है।
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच “विशेष रणनीतिक साझेदारी” पिछले एक दशक में लगातार मजबूत हुई है। इस साझेदारी के तहत व्यापार, तकनीक, रक्षा और निवेश के क्षेत्रों में व्यापक सहयोग विकसित हुआ है।
इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक संतुलन
दक्षिण कोरिया की विदेश नीति में “ग्लोबल साउथ” की ओर झुकाव स्पष्ट दिख रहा है। यह उसकी पुरानी “न्यू साउदर्न पॉलिसी” का विस्तार है। भारत, जो ग्लोबल साउथ की प्रमुख आवाज माना जाता है, इस रणनीति में एक अहम साझेदार बनकर उभर रहा है।
भारत के लिए भी यह दौरा महत्वपूर्ण है, क्योंकि दक्षिण कोरिया से उसे सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग मिल सकता है। इससे भारत के विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलेगी और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों को गति मिलेगी।
ऊर्जा और सप्लाई चेन पर खास नजर
वैश्विक स्तर पर संरक्षणवाद, व्यापारिक अस्थिरता और ऊर्जा संकट के बीच यह यात्रा दोनों देशों के लिए अवसर लेकर आई है। भारत और दक्षिण कोरिया अपनी आर्थिक साझेदारियों को विविध बनाने और मजबूत सप्लाई चेन नेटवर्क तैयार करने पर जोर दे रहे हैं।
राष्ट्रपति ली की कूटनीति व्यावहारिक और परिणाम-आधारित मानी जाती है। इस यात्रा के जरिए वे कोरियाई उद्योगों के लिए नए बाजार और निवेश के अवसर तलाशना चाहते हैं।
क्यों अहम है यह दौरा
यह सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में रणनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास है। भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ता सहयोग न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक विकास को भी नई दिशा देगा।