कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में सी. पी. राधाकृष्णन का बड़ा संदेश

Sat 03-Oct-2026,11:15 PM IST +05:30

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कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में सी. पी. राधाकृष्णन का बड़ा संदेश Kautilya Economic Conclave
  • पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में सी. पी. राधाकृष्णन ने दिया उद्घाटन भाषण।

  • आर्थिक लचीलेपन के साथ सामाजिक और वित्तीय समावेशन पर दिया जोर।

  • 2047 तक विकसित भारत के लिए शोध, नवाचार और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता बताई।

Delhi / New Delhi :

New Delhi / नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने उद्घाटन भाषण दिया। सम्मेलन का विषय ‘फ्लक्स के युग में लचीलापन’ रखा गया। नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और व्यापार जगत के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच ऐसी आर्थिक नीतियों की जरूरत पर जोर दिया, जो लचीली, समावेशी और जवाबदेह हों।

उपराष्ट्रपति ने इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ यानी IEG की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि 1952 में प्रोफेसर वी. के. आर. वी. राव के नेतृत्व में स्थापित यह संस्थान भारत की विकास यात्रा से लंबे समय से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा कि मजबूत नीति निर्माण के लिए जमीनी वास्तविकताओं की समझ जरूरी है और नीतियों को बदलती परिस्थितियों के अनुसार लचीला तथा उत्तरदायी बनाए रखना होगा।

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि परिवर्तन के दौर में निर्णायकता को व्यापक सहमति से जोड़ना जरूरी है। उनके मुताबिक बहस और चर्चा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य ऐसे निर्णयों तक पहुंचना होना चाहिए, जिन्हें व्यापक स्वीकृति मिले। राज्यसभा के सभापति के रूप में उन्होंने स्वतंत्र और पारदर्शी बहस को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताया और कहा कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी जरूरी है।

उपराष्ट्रपति ने भारत के विकास मॉडल का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने लोकतंत्र और आर्थिक विकास को साथ-साथ आगे बढ़ाने की क्षमता दिखाई है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक ढांचे में हासिल आर्थिक वृद्धि और समावेशी प्रगति के साथ सहमति निर्माण ने आर्थिक सुधारों को स्थिरता प्रदान की है। उन्होंने इसे 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण आधार बताया।

आर्थिक लचीलेपन को सामाजिक लचीलेपन से जोड़ते हुए उन्होंने JAM ट्रिनिटी, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और GST की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अगस्त 2026 तक 590 मिलियन से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके हैं, जबकि GST पंजीकरण 2017 के करीब 6.65 मिलियन से बढ़कर मई 2026 में 16.5 मिलियन हो गया।

उन्होंने कहा कि समावेशन का मतलब केवल लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें मूल्य सृजन, आय अर्जन और उद्यमिता के अवसर देना भी है। उन्होंने करीब 9.2 मिलियन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 100 मिलियन से अधिक ग्रामीण महिलाओं और 34.6 मिलियन से ज्यादा लखपति दीदियों का उल्लेख किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि वास्तविक लचीलापन तब बनता है, जब गांव की महिला बैंक खाते, प्रत्यक्ष लाभ और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करती है। उन्होंने 250 मिलियन से अधिक भारतीयों के अत्यधिक गरीबी से बाहर निकलने का भी उल्लेख किया।

समापन में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और IEG के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि शोध, शिक्षा, नवाचार और उद्यमिता को मजबूत करने वाली साझेदारियां भारत की विकास यात्रा में योगदान देंगी। उनके अनुसार भारत का लचीलापन बदलाव का विरोध करने में नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास, समावेश और सामूहिक प्रयास के साथ अपनाने में है।