Global Food Inflation Crisis | दुनियाभर में खाद्य महंगाई का संकट, 2027 तक बढ़ सकती हैं खाने-पीने की कीमतें
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Global Food Inflation Crisis
दुनिया में खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका, असर 2027 तक रह सकता है।
भारत में चीनी, प्याज और दालों की कीमतों में तेजी।
युद्ध, महंगे ईंधन और सूखे से खाद्य आपूर्ति पर दबाव।
New Delhi / सोचिए, अगर रोज की थाली का खर्च अचानक दोगुना हो जाए, तो परिवार कैसे गुजारा करेगा? दुनिया के कई देशों में खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। अब आशंका है कि यह संकट 2027 तक और गहरा सकता है।
दुनियाभर में खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतें आम लोगों की चिंता बढ़ा रही हैं। सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के कारण समुद्री परिवहन में रुकावट, ईंधन और खाद की बढ़ती लागत तथा अल नीनो से जुड़ी सूखे की आशंकाएं आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकती हैं। इसका असर 2027 तक बने रहने की आशंका जताई गई है।
इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में 63 वर्षीय पार्किंग अटेंडेंट मुहम्मद यासीन इसकी एक मिसाल हैं। यासीन के मुताबिक, पहले चावल, टेम्पेह और टोफू जैसी चीजें खरीदने के लिए उन्हें 7,000 से 8,000 इंडोनेशियाई रुपिया खर्च करने पड़ते थे। अब इसी सामान की कीमत करीब 15,000 रुपिया हो गई है। उनकी साप्ताहिक कमाई केवल 2 लाख से 3 लाख रुपिया है। बढ़ती कीमतों के कारण उन्हें अपने भोजन में कटौती करनी पड़ रही है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन यानी एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी है कि खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। उनके अनुसार, इस साल के अंत से लेकर अगले साल तक इसका असर और गंभीर हो सकता है।
एफएओ के खाद्य मूल्य सूचकांक के मुताबिक, सितंबर में इसका स्तर 136 अंक रहा, जो नवंबर 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर बताया गया है। वहीं, विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, जिन 150 देशों का विश्लेषण किया गया, उनमें से 22 प्रतिशत देशों में सितंबर तिमाही के दौरान खाद्य कीमतों की महंगाई सामान्य महंगाई से अधिक रही। पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत था।
भारत में भी खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में चीनी, प्याज और दालों की कीमतें पिछले महीने के मुकाबले 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ीं। कमजोर मानसून के कारण उत्पादन प्रभावित होने की आशंका ने भी चिंता बढ़ाई है। एशिया के प्रमुख निर्यातक देशों में चावल की कीमतें 10 से 13 प्रतिशत तक बढ़ने की जानकारी दी गई है, जबकि 2026 में गेहूं की कीमतों में 30 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
मध्य पूर्व में भी हालात चुनौतीपूर्ण हैं। मिस्र में बिना सब्सिडी वाली ब्रेड की कीमत जुलाई में चार मिस्री पाउंड प्रति बड़ी रोटी से बढ़कर करीब पांच पाउंड हो गई है। संयुक्त अरब अमीरात में खाना पकाने के तेल की कीमत लगभग 40 प्रतिशत बढ़ने की जानकारी भी रिपोर्ट में दी गई है।
इस संकट के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से काला सागर के रास्ते गेहूं की आपूर्ति प्रभावित हुई है। लाल सागर में असुरक्षा के कारण जहाजों को लंबे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई महंगी हो गई है। कुछ प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों पर माल ढुलाई की लागत करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ने की बात कही गई है।
इसके अलावा, ईरान से जुड़े युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों और होर्मुज जलडमरूमध्य से खाद के निर्यात पर दबाव पड़ा है। दूसरी ओर, अल नीनो से जुड़ी शुष्क परिस्थितियां भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपूर्ति में बाधाएं बनी रहती हैं और बड़े आयातक देश फिर से वैश्विक बाजारों में खरीदारी बढ़ाते हैं, तो कीमतों पर दबाव और तेज हो सकता है। हालांकि, दक्षिणी गोलार्ध में गेहूं की अच्छी फसल इस जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकती है।
कुल मिलाकर, खाद्य महंगाई का बढ़ता संकट गरीब और मध्यम आय वाले परिवारों के बजट पर भारी पड़ सकता है। आने वाले महीनों में फसल उत्पादन, युद्ध की स्थिति और परिवहन लागत तय करेंगे कि आम लोगों की थाली कितनी महंगी होती है।
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