IDBI बैंक विनिवेश: 2018 के फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा?
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IDBI Disinvestment: Delhi High Court Verdict
2018 में अदालत ने IDBI में सरकारी हिस्सेदारी घटाने पर कानूनी प्रतिबंध होने की दलील खारिज की।
IDBI निरसन अधिनियम 2003: संसद में प्रस्तावित संशोधन कानून का हिस्सा नहीं बना।
केंद्रीय बजट 2016-17 और 2021-22 में IDBI बैंक के विनिवेश से जुड़ी योजनाओं का उल्लेख किया गया।
New Delhi / क्या संसद में वर्षों पहले दिया गया कोई बयान सरकार को आज बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने से रोक सकता है? IDBI बैंक के रणनीतिक विनिवेश से जुड़े इसी महत्वपूर्ण सवाल पर दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला एक बार फिर चर्चा में है। जानिए क्या है पूरा मामला और सरकार का पक्ष।
IDBI बैंक में सरकार की हिस्सेदारी घटाने और रणनीतिक विनिवेश को लेकर कानूनी तथा नीतिगत बहस एक बार फिर सामने आई है। इस मामले में वर्ष 2003 के विधायी घटनाक्रम, दिल्ली उच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के फैसले और केंद्रीय बजट में सरकार की ओर से दिए गए बयानों का हवाला दिया गया है।
प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, सरकार का कहना है कि वर्ष 2003 में IDBI से संबंधित कानून पर संसदीय चर्चा के दौरान सरकार की हिस्सेदारी में कमी को सीमित करने के उद्देश्य से एक संशोधन प्रस्तावित किया गया था। हालांकि, यह संशोधन अंततः स्वीकार नहीं हुआ और अधिनियमित कानून का हिस्सा नहीं बना।
अब सवाल है कि इस कानूनी स्थिति पर अदालत ने क्या कहा था?
इस मामले की सुनवाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऑल इंडिया IDBI ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में की थी। 17 दिसंबर 2018 को सुनाए गए फैसले में अदालत ने संबंधित याचिका खारिज कर दी थी।
फैसले के पैरा 41 में अदालत ने स्पष्ट किया कि संसद में बहस के दौरान दिए गए बयान, संसद द्वारा पारित कानून का स्थान नहीं ले सकते और न ही कानून के प्रभाव को बदल सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि केवल संसदीय वक्तव्यों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि सरकार ने कर्मचारियों से ऐसा बाध्यकारी वादा किया था, जिसके कारण वह अपनी हिस्सेदारी कम नहीं कर सकती।
यहां प्रॉमिसरी एस्टॉपल यानी वचनबद्धता विबंधन का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। सामान्य रूप से यह सिद्धांत कुछ परिस्थितियों में किसी पक्ष को अपने पहले किए गए आश्वासन से पीछे हटने से रोक सकता है। लेकिन इस मामले में अदालत ने माना कि संसदीय बहस के दौरान दिए गए वक्तव्यों के आधार पर इस सिद्धांत का इस्तेमाल करके सरकार की हिस्सेदारी घटाने की शक्ति पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
फैसले के पैरा 42 में अदालत ने कहा कि IDBI निरसन अधिनियम, 2003 की भाषा स्पष्ट है। उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके आधार पर सरकार को IDBI लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी घटाने या पूरी तरह समाप्त करने से रोका जा सके।
अब बात करते हैं केंद्रीय बजट में सरकार के रुख की।
वर्ष 2016-17 के केंद्रीय बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने IDBI बैंक के रूपांतरण की प्रक्रिया का उल्लेख किया था। उनके भाषण में सरकार की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कम करने के विकल्प पर विचार करने की बात कही गई थी।
इसके बाद, केंद्रीय बजट 2021-22 में तत्कालीन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने IDBI बैंक सहित कई संस्थाओं के रणनीतिक विनिवेश से जुड़े लेन-देन को आगे बढ़ाने की बात कही थी। बजट भाषण में वर्ष 2021-22 के दौरान इन लेन-देन को पूरा करने का प्रस्ताव रखा गया था।
इस पूरे मामले का महत्व क्या है?
वर्ष 2003 के विधायी इतिहास, वर्ष 2018 के न्यायिक फैसले और केंद्रीय बजट में दिए गए बयानों को साथ देखने पर IDBI बैंक के रणनीतिक विनिवेश को लेकर सरकार की नीतिगत दिशा समझने में मदद मिलती है। अदालत के फैसले का प्रमुख निष्कर्ष यह था कि संसदीय बहस में दिए गए बयान, अधिनियमित कानून में मौजूद स्पष्ट प्रावधानों को बदल नहीं सकते।
हालांकि, यह फैसला अपने आप में किसी विनिवेश प्रक्रिया के पूरा होने की पुष्टि नहीं करता। बैंक में हिस्सेदारी घटाने या विनिवेश से जुड़े किसी भी कदम की वर्तमान स्थिति जानने के लिए आधिकारिक घोषणाओं और संबंधित दस्तावेजों को देखना जरूरी है।
ऐसी ही महत्वपूर्ण खबरों और कानूनी-आर्थिक मामलों की जानकारी के लिए देखते रहिए AGCNN NEWS। नमस्कार!