ड्रायलैंड कांग्रेस 2026: शुष्क-भूमि विकास और जलवायु लचीलेपन पर जोर

Fri 11-Sep-2026,07:33 PM IST +05:30

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ड्रायलैंड कांग्रेस 2026: शुष्क-भूमि विकास और जलवायु लचीलेपन पर जोर Dryland Congress 2026
  • शुष्क-भूमि विकास में जलग्रहण आधारित समेकित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया।

  • डिजिटल तकनीक और प्रस्तावित जलग्रहण पोर्टल से निगरानी मजबूत करने की बात कही गई।

  • किसानों, स्थानीय समुदायों और संस्थानों की भागीदारी को जलवायु लचीलेपन के लिए जरूरी बताया गया।

Delhi / New Delhi :

New Delhi / भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के सचिव नरेंद्र भूषण ने कहा है कि सूखे के बाद राहत और पुनर्वास तक सीमित रहने के बजाय देश को शुष्क-भूमि क्षेत्रों को पहले से अधिक मजबूत और जलवायु के प्रति लचीला बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने इसके लिए समेकित जलग्रहण क्षेत्र विकास, आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। नई दिल्ली के राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर में ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 के पार्टनर स्पॉटलाइट कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने “रिइमैजिनिंग ड्राइलैंड्स: इंस्टीट्यूशन्स, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एंड कम्युनिटी एक्शन फॉर अ क्लाइमेट-रेज़िलिएंट फ्यूचर” विषय पर अपने विचार रखे।

शुष्क-भूमि को बंजर मानने की जरूरत नहीं
10 सितंबर से नई दिल्ली में आयोजित ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 शुष्क-भूमि कृषि के भविष्य पर चर्चा का अंतरराष्ट्रीय मंच बनकर उभरी है। इसमें 25 से अधिक देशों के 800 से ज्यादा वैज्ञानिक, नीति-निर्माता, विकास भागीदार, उद्योग प्रतिनिधि, शिक्षाविद, नागरिक समाज संगठन और किसान शामिल हो रहे हैं। सम्मेलन में विज्ञान, तकनीक और नीतिगत उपायों के माध्यम से टिकाऊ और मजबूत शुष्क-भूमि कृषि प्रणालियां विकसित करने पर चर्चा की जा रही है।

नरेंद्र भूषण ने कहा कि शुष्क-भूमि को बंजर क्षेत्र समझना सही नहीं है। ये जीवंत और उत्पादक परिदृश्य हैं, जिनकी क्षमता जलवायु परिवर्तन और वर्षा की अनिश्चितता से प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि भारत में वर्षा आधारित कृषि लगभग 6.139 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है, जो देश के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का करीब 43 प्रतिशत है और कुल खाद्य उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत योगदान देती है।

जलग्रहण विकास से भूमि और आजीविका दोनों को लाभ
नरेंद्र भूषण ने समेकित परिदृश्य प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यदि परिदृश्य को पुनर्स्थापित किया जाता है, तो जल चक्र को भी बेहतर बनाया जा सकता है और इससे लोगों की आजीविका को मजबूती मिलती है। उन्होंने कहा कि शुष्क-भूमि क्षेत्रों में जलग्रहण आधारित दृष्टिकोण विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि इसमें भूमि, जल, वनस्पति और आजीविका को एक साथ जोड़ा जाता है।

उन्होंने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जलग्रहण विकास घटक यानी डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, पिछले 12 वर्षों में लगभग 3.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में 7,602 जलग्रहण विकास परियोजनाएं लागू की गई हैं। इन परियोजनाओं के तहत करीब 9 लाख जल संचयन संरचनाओं का निर्माण या पुनरुद्धार किया गया है और लगभग 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सुरक्षात्मक सिंचाई उपलब्ध कराई गई है।

इन पहलों से करीब 60 लाख किसानों को लाभ मिलने के साथ 6.7 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार सृजित हुआ है। लगभग 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को पौधरोपण के अंतर्गत भी शामिल किया गया है।

जलग्रहण परियोजनाओं में तकनीक की बढ़ती भूमिका
भूषण ने जलग्रहण विकास को प्राकृतिक पूंजी में निवेश बताते हुए कहा कि पूरी हो चुकी परियोजनाओं में लगभग 2:1 का लाभ-लागत अनुपात देखा गया है। इन परियोजनाओं से भूजल स्तर, खेती के क्षेत्र, फसल सघनता, दुग्ध उत्पादन और किसानों की आय में सुधार जैसे सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

उन्होंने कहा कि अब जलग्रहण विकास को केवल GIS आधारित नक्शों और परिसंपत्तियों की जानकारी तक सीमित नहीं रखना चाहिए। तकनीक के माध्यम से यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि किसी क्षेत्र की जलवायु और पर्यावरणीय लचीलापन वास्तव में कितना बढ़ रहा है।

प्रस्तावित जलग्रहण पोर्टल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जलग्रहण परियोजनाओं के पूरे जीवनचक्र को एक मंच पर लाने के साथ प्रमुख भू-स्थानिक आंकड़ों को भी एकीकृत करेगी।

समुदायों की भागीदारी जरूरी
नरेंद्र भूषण ने कहा कि डिजिटल तकनीक प्रमाण उपलब्ध करा सकती है, संस्थाएं आवश्यक ढांचा तैयार कर सकती हैं, लेकिन किसी भी योजना की दीर्घकालिक सफलता के लिए समुदाय का स्वामित्व जरूरी है। उन्होंने सरकार, अनुसंधान संस्थानों, विकास भागीदारों और स्थानीय समुदायों के बीच मजबूत साझेदारी की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि भारत के पास ऐसा शुष्क-भूमि विकास रोडमैप तैयार करने का अवसर है, जिसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सके और जो भूमि बहाली तथा ग्रामीण समृद्धि के क्षेत्र में दुनिया के लिए मॉडल बन सके। यह दृष्टिकोण विकसित भारत@2047 के लक्ष्य में भी योगदान दे सकता है।

नरेंद्र भूषण ने कहा कि जलग्रहण क्षेत्र को केवल किसी एक परियोजना की सीमा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे ऐसा व्यापक मंच बनाया जाना चाहिए, जो प्राकृतिक पूंजी के पुनर्स्थापन, जल सुरक्षा, कृषि की मजबूती, ग्रामीण रोजगार और जलवायु लचीलेपन को एक साथ आगे बढ़ाए। उनका संदेश स्पष्ट रहा कि शुष्क क्षेत्रों में सूखा आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से तैयारी, वैज्ञानिक योजना, डिजिटल तकनीक और सामुदायिक भागीदारी के जरिए टिकाऊ विकास का आधार तैयार करना अधिक प्रभावी रास्ता है।