वंदे मातरम अनिवार्यता पर कांग्रेस-भाजपा में तीखा सियासी टकराव
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सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम अनिवार्य करने के फैसले पर कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कांग्रेस पर ऐतिहासिक निर्णयों को लेकर आरोप लगाए, जिससे प्रदेश की राजनीति में वैचारिक टकराव बढ़ा।
Bhopal/ प्रदेश में सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम को अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। इस मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गई हैं। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद और भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा के बीच तीखी बयानबाजी ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। दोनों नेताओं ने अपने-अपने दलों की विचारधारा के अनुरूप प्रतिक्रिया दी है, जिससे आने वाले दिनों में यह विषय और अधिक राजनीतिक तूल पकड़ सकता है।
सरकारी आयोजनों में वंदे मातरम की अनिवार्यता को लेकर उठे विवाद पर कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने सावधानी भरा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी तक संबंधित आदेश का अध्ययन नहीं किया है और बिना पूरी जानकारी के प्रतिक्रिया देना उचित नहीं होगा। मसूद ने स्पष्ट किया कि पहले भी कुछ प्रावधानों पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं, इसलिए यह देखना जरूरी है कि वर्तमान आदेश में क्या संशोधन किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश की आजादी की लड़ाई में कांग्रेस की भूमिका सर्वविदित है और भाजपा उस समय अस्तित्व में नहीं थी।
बुरहानपुर में आयोजित एक आमसभा के दौरान मसूद ने अपनी ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए कहा कि यह नई दौर की कांग्रेस है, जिसमें सक्रियता और जनसंपर्क को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने उन नेताओं को चेतावनी दी जो केवल चुनावी राजनीति तक सीमित रहते हैं। मसूद ने कहा कि पार्टी को कमजोर करने वालों के लिए संगठन में जगह नहीं होगी और कार्यकर्ताओं को जनआंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
दूसरी ओर भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस की नीतियों के कारण ही पहले वंदे मातरम को पूर्ण रूप से अनिवार्य नहीं किया जा सका। शर्मा ने कहा कि ऐतिहासिक संदर्भों में कांग्रेस ने दबाव में आकर वंदे मातरम के मूल स्वरूप में बदलाव किया था। उन्होंने इसे राष्ट्रगौरव का विषय बताते हुए कहा कि सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम गाया जाना राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।
इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बयानबाजी तेज होती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष का भी हिस्सा है। आने वाले समय में इस विषय पर विधानसभा और जनसभाओं में और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।