वेलमुरुगन ने बताया कि विधानसभा चुनाव को लेकर सीट बंटवारे की बातचीत के दौरान उनकी पार्टी को एक सीट देने का आश्वासन मिला था, लेकिन बाद में उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उनका आरोप है कि द्रमुक का रवैया सहयोगी दलों के प्रति दबावपूर्ण रहा है और छोटे दलों की बातों को लगातार अनदेखा किया गया। यही कारण है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भी असंतोष बढ़ता जा रहा था।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी लगातार सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाती रही है, लेकिन गठबंधन के भीतर इन मुद्दों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। जब उन्होंने सरकार से जनहित से जुड़े सवालों पर ध्यान देने की अपील की, तब भी उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। वेलमुरुगन के अनुसार, यह स्थिति किसी भी सहयोगी दल के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।
अपने बयान में उन्होंने साफ तौर पर कहा, “हम किसी की भी ‘बड़ा भाई’ वाली सोच को स्वीकार नहीं करेंगे। हमारी पार्टी के साथ इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।” इसी नाराजगी के चलते उन्होंने DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन से बाहर आने का फैसला लिया।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखेगी और बहुत जल्द नए राजनीतिक विकल्प के साथ सामने आएगी।
वेलमुरुगन ने संकेत दिया कि उनकी पार्टी अन्य राजनीतिक दलों के साथ बातचीत कर रही है और आने वाले समय में एक नए गठबंधन की घोषणा की जा सकती है। इस फैसले के बाद तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना बढ़ गई है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि वेलमुरुगन का अगला कदम क्या होगा और वह किसके साथ मिलकर नई राजनीतिक रणनीति तैयार करेंगे।