छात्र शक्ति से राष्ट्र शक्ति तक : एबीवीपी की 78 वर्षों की यात्रा- डॉ. कठेरिया

Fri 10-Jul-2026,04:58 PM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

छात्र शक्ति से राष्ट्र शक्ति तक : एबीवीपी की 78 वर्षों की यात्रा- डॉ. कठेरिया ABVP Foundation Day
  • एबीवीपी की स्थापना 9 जुलाई 1949 को छात्र शक्ति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने के उद्देश्य से हुई।

  • संगठन "ज्ञान, शील और एकता" के सिद्धांत पर व्यक्तित्व और नेतृत्व विकास को बढ़ावा देता है।

  • 78 वर्षों में एबीवीपी ने छात्र हितों, सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय एकात्मता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / भारत को प्रायः युवाओं का देश कहा जाता है और किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवा वर्ग की सोच, चरित्र, नेतृत्व क्षमता तथा सामाजिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है। यही कारण है कि छात्र संगठनों की भूमिका केवल शैक्षणिक परिसरों तक सीमित नहीं मानी जाती। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने राष्ट्र निर्माण की अनेक चुनौतियाँ थीं, जिनके समाधान में युवाओं और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी को महत्वपूर्ण माना गया। इसी पृष्ठभूमि में 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की स्थापना हुई। संगठन का उद्देश्य विद्यार्थियों की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हुए उन्हें राष्ट्र और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाना था।

संगठन के प्रारंभिक विकास में बलराज मधोक तथा बाद के वर्षों में प्रोफेसर यशवंतराव केलकर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। "ज्ञान, शील और एकता" को प्रेरक सूत्र बनाकर एबीवीपी ने शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय एकात्मता को अपने कार्यों का आधार बनाया। समय के साथ संगठन ने विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अपनी उपस्थिति स्थापित की तथा छात्र सहभागिता, नेतृत्व विकास और सामाजिक जागरूकता के विविध कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। संगठन के अनुसार आज इसके सदस्य और कार्यकर्ताओं की संख्या 50 लाख से अधिक है, जिसके आधार पर इसे विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठनों में गिना जाता है।

एबीवीपी लंबे समय से इस विचार को रेखांकित करती रही है कि छात्र केवल भविष्य के नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रीय जीवन के सक्रिय सहभागी भी हैं। इसी दृष्टिकोण के तहत छात्र जीवन को व्यक्तित्व निर्माण की महत्वपूर्ण अवस्था माना गया है। प्रशिक्षण शिविरों, अध्ययन वर्गों, विचार-विमर्श, संगोष्ठियों और नेतृत्व कार्यशालाओं के माध्यम से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, संवाद कौशल, अनुशासन, निर्णय क्षमता और नेतृत्व गुणों के विकास का प्रयास किया जाता है। स्वामी विवेकानंद के "व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण" के विचार की झलक भी संगठन की अनेक गतिविधियों में दिखाई देती है। इस दृष्टि से छात्र जीवन को केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित न मानकर सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों की तैयारी का काल माना जाता है।

छात्र हितों से जुड़े प्रश्नों को उठाने के साथ-साथ एबीवीपी ने सामाजिक उत्तरदायित्व पर भी बल दिया है। शिक्षा की गुणवत्ता, छात्र सुविधाओं और शैक्षिक सुधारों के मुद्दों के अलावा सेवा गतिविधियों, रक्तदान, स्वास्थ्य जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण, आपदा सहायता और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रमों में विद्यार्थियों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए अध्ययन सहयोग, मार्गदर्शन और शैक्षणिक सहायता जैसी पहलें भी समय-समय पर संचालित की गई हैं। महिला सशक्तीकरण, आत्मरक्षा और नेतृत्व विकास से जुड़े कार्यक्रमों ने छात्राओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।

राष्ट्र निर्माण की अवधारणा एबीवीपी के विचार और कार्यों का एक महत्वपूर्ण पक्ष रही है। संगठन का मानना है कि शिक्षित, जागरूक और उत्तरदायी युवा ही किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होते हैं। इसी कारण व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक सहभागिता और सक्रिय नागरिकता को राष्ट्र निर्माण की आधारभूत प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाता है। विभिन्न सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्रों के विद्यार्थियों के बीच संवाद, राष्ट्रीय एकात्मता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाली गतिविधियाँ भी इसी दृष्टिकोण का हिस्सा हैं। इससे विद्यार्थियों को भारत की विविधता को समझने और व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि विकसित करने का अवसर मिलता है।

हालाँकि किसी भी बड़े संगठन की तरह एबीवीपी भी बहस, आलोचनाओं और चुनौतियों से अछूती नहीं रही है। छात्र राजनीति, बदलते सामाजिक परिवेश, डिजिटल युग की चुनौतियाँ, रोजगार, कौशल विकास, मानसिक स्वास्थ्य और नवाचार जैसे विषय आज छात्र समुदाय के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न बनकर उभरे हैं। ऐसे समय में छात्र संगठनों की प्रासंगिकता इस बात से तय होगी कि वे विद्यार्थियों को केवल आंदोलनों तक सीमित रखते हैं या उन्हें नेतृत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया से भी जोड़ते हैं।

आज जब भारत युवा शक्ति के बल पर भविष्य की ओर अग्रसर है, तब व्यक्तित्व निर्माण, उत्तरदायी नागरिकता और राष्ट्र निर्माण के बीच संबंध को समझना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। एबीवीपी की यात्रा इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, क्योंकि उसने छात्र जीवन को व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों से जोड़ने का प्रयास किया है। इसके योगदान और भूमिका का मूल्यांकन विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जा सकता है, किंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत के छात्र जीवन और युवा नेतृत्व के विमर्श में एबीवीपी ने एक उल्लेखनीय स्थान बनाया है।

संप्रति:
लेखक : डॉ. धरवेश कठेरिया
एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
Email: [email protected]