Green Urea Mission: सरकार ने ग्रीन फर्टिलाइजर उत्पादन के लिए बढ़ाया कदम
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Green Urea Mission
भारत में ग्रीन यूरिया प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया को गति मिली।
ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया आधारित उर्वरक उत्पादन पर जोर।
कृषि आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को मिलेगा लाभ।
Delhi / भारत ने हरित और टिकाऊ कृषि व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए देश में ग्रीन यूरिया उत्पादन की संभावनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाने की शुरुआत कर दी है। उर्वरक विभाग ने हाल ही में भारत के विभिन्न हिस्सों में ग्रीन यूरिया प्लांट स्थापित करने के उद्देश्य से एक उच्च स्तरीय ‘प्री-एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EOI) बैठक आयोजित की। इस बैठक की अध्यक्षता उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव एवं पीडीआईएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. के.के. पाठक ने की।
नोएडा स्थित पीडीआईएल मुख्यालय में आयोजित इस बैठक में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कई प्रमुख कंपनियों ने भाग लिया। इनमें एनटीपीसी, भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI), प्रमुख उर्वरक कंपनियां, ग्रीन हाइड्रोजन एवं ग्रीन अमोनिया उत्पादक कंपनियां और तकनीकी सेवा प्रदाता शामिल रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत को कार्बन-न्यूट्रल उर्वरक उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे ले जाएगी।
बैठक के दौरान ग्रीन यूरिया उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए सरकार की विभिन्न योजनाओं और वित्तीय सहायता पर विस्तार से चर्चा हुई। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय पहले ही ग्रीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए लगभग 19,744 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा कर चुका है। वहीं उर्वरक विभाग को ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया को देश की उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर भी चर्चा की कि वर्तमान समय में ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया का उत्पादन पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक महंगा है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए एक विशेष मूल्य निर्धारण व्यवस्था तैयार की जा रही है, जिससे उत्पादकों और उर्वरक कंपनियों दोनों को आर्थिक सुरक्षा मिल सके। भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) पहले ही ग्रीन अमोनिया खरीद के लिए निविदाएं जारी कर चुका है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
सरकार निजी क्षेत्र को आकर्षित करने के लिए प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन भी दे रही है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन अमोनिया उत्पादन के लिए 10 वर्षों तक निश्चित लाभ सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था तैयार की गई है। इससे निवेशकों को दीर्घकालिक स्थिरता और भरोसा मिलेगा।
इस पूरी पहल का तकनीकी आधार आंध्र प्रदेश के पुदिमाडाका में स्थापित 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाले ग्रीन यूरिया पायलट प्लांट को माना जा रहा है। एनटीपीसी की अनुसंधान इकाई NETRA द्वारा विकसित यह परियोजना ग्रीन हाइड्रोजन, जल इलेक्ट्रोलिसिस और कार्बन कैप्चर तकनीक को जोड़कर स्वच्छ उर्वरक उत्पादन का सफल मॉडल प्रस्तुत करती है।
भारत के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश हर वर्ष लगभग एक करोड़ मीट्रिक टन यूरिया का आयात करता है। इसके अलावा कई मौजूदा उर्वरक संयंत्र तीन दशक से अधिक पुराने हो चुके हैं। ऐसे में नई और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन क्षमता विकसित करना समय की आवश्यकता बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर और उर्वरक उत्पादन को एकीकृत रूप से विकसित किया जाए, तो भारत न केवल अपनी उर्वरक जरूरतों में आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि अपने ‘नेट जीरो 2070’ लक्ष्य की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ सकता है।
ग्रीन यूरिया परियोजनाएं आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। यह पहल किसानों, उद्योगों और देश की अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित करने की दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है।