सरकारी खर्च पर डिजिटल निगरानी! ओम बिरला का बड़ा प्रस्ताव, क्या बदलेगा?

Wed 04-Nov-2026,11:23 PM IST +05:30

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सरकारी खर्च पर डिजिटल निगरानी! ओम बिरला का बड़ा प्रस्ताव, क्या बदलेगा? PAC Conference
  • ओम बिरला ने राज्य विधानमंडलों के लिए डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म का प्रस्ताव रखा।

  • ‘केरलम संकल्प’ में वित्तीय अनुशासन और पारदर्शी शासन पर जोर दिया गया।

  • के. सी. वेणुगोपाल ने समयबद्ध ऑडिट, प्रशिक्षण और डिजिटल डैशबोर्ड की वकालत की।

Delhi / New Delhi :

New Delhi / सरकारी खजाने के एक-एक रुपये का हिसाब कौन रखेगा? क्या अब तकनीक की मदद से सरकारी खर्च और योजनाओं की निगरानी पहले से ज्यादा पारदर्शी होगी? तिरुवनंतपुरम में हुए सम्मेलन से निकले प्रस्ताव देश की वित्तीय जवाबदेही की तस्वीर बदल सकते हैं।

सरकारी धन का सही इस्तेमाल हो, योजनाओं पर खर्च किए गए पैसे का पूरा हिसाब मिले और सरकारी विभागों की जवाबदेही तय हो, इसके लिए लोक लेखा समितियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। अब इन समितियों के कामकाज को और प्रभावी बनाने के लिए तकनीक के अधिक इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है।

दरअसल, संसद तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विधानमंडलों की लोक लेखा समितियों के सभापतियों का दो दिवसीय सम्मेलन तिरुवनंतपुरम में संपन्न हुआ। समापन समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विधायी समितियों के कामकाज में प्रौद्योगिकी को अधिक से अधिक शामिल करने का आह्वान किया।

उन्होंने राज्य विधानमंडलों के लिए एक डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने का प्रस्ताव रखा। यह प्लेटफॉर्म संसद की समितियों के लिए उपलब्ध डिजिटल व्यवस्था की तर्ज पर तैयार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य लेखापरीक्षा टिप्पणियों की निगरानी, उन पर कार्रवाई और रिपोर्टों की समयबद्ध जांच को बेहतर बनाना है।

ओम बिरला ने कहा कि तकनीक से विधायी निगरानी की दक्षता, पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़ सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीक कभी भी मानवीय विवेक और निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं बन सकती। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध आंकड़ों की सटीकता, प्रमाणिकता और निष्पक्षता बनाए रखना भी जरूरी है।

सम्मेलन में लोकसभा की लोक लेखा समिति के सभापति के. सी. वेणुगोपाल द्वारा दिए गए सुझावों का भी उल्लेख किया गया। ओम बिरला ने संसद और राज्य विधानमंडलों की समितियों से मिलकर लेखापरीक्षा और मूल्यांकन की एक व्यापक व्यवस्था विकसित करने की अपील की, ताकि जांच और रिपोर्टों के निस्तारण से जुड़ी चुनौतियों का समाधान किया जा सके।

उन्होंने कहा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG स्वतंत्र रूप से लेखापरीक्षा करते हैं, जबकि लोक लेखा समितियों की जिम्मेदारी इन निष्कर्षों की जांच करना और उन पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। केवल रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन रिपोर्टों के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार भी दिखाई देना चाहिए।

इस सम्मेलन में अंगीकृत ‘केरलम संकल्प’ को भी महत्वपूर्ण बताया गया। ओम बिरला के अनुसार, यह संकल्प आने वाले वर्षों में लोक लेखा समितियों के कामकाज को मजबूत बनाने के लिए मार्गदर्शक ढांचा साबित हो सकता है। इसका उद्देश्य वित्तीय अनुशासन, संस्थागत क्षमता और शासन में पारदर्शिता को बढ़ावा देना है।

उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, सामाजिक कल्याण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सरकारी निवेश लगातार बढ़ रहा है। इसलिए सार्वजनिक धन के प्रत्येक रुपये का सही हिसाब होना चाहिए। समितियों को केवल खर्च की जांच नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि योजनाओं का वास्तविक लाभ नागरिकों तक पहुंच रहा है या नहीं।

वहीं, लोकसभा की लोक लेखा समिति के सभापति के. सी. वेणुगोपाल ने कहा कि सार्वजनिक धन के इस्तेमाल की प्रक्रिया लगातार जटिल होती जा रही है। ऐसे में समितियों को भी बदलते समय के अनुरूप खुद को विकसित करना होगा। उन्होंने सरकारी विभागों से लेखापरीक्षा संबंधी सवालों के समय पर और पूर्ण जवाब देने की अपील की।

वेणुगोपाल ने सुझाव दिया कि संसद और प्रत्येक राज्य विधानमंडल में लोक लेखा समिति की कम से कम एक रिपोर्ट पर चर्चा होनी चाहिए। साथ ही, केंद्र प्रायोजित योजनाओं की जांच के लिए केंद्रीय और राज्य लोक लेखा समितियों की साल में कम से कम एक संयुक्त बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने डैशबोर्ड, विशेषज्ञ कर्मचारियों की उपलब्धता और नियमित प्रशिक्षण के महत्व पर भी जोर दिया।

इस दो दिवसीय सम्मेलन में 27 राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। ‘लेखापरीक्षा, जवाबदेही और सुशासन—लोक लेखा समिति की बदलती भूमिका’ विषय पर हुए विचार-विमर्श में वित्तीय निगरानी, तकनीकी नवाचार और संस्थागत प्रभावशीलता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

कुल मिलाकर, सम्मेलन का संदेश साफ है—सरकारी धन का इस्तेमाल पारदर्शी हो, योजनाओं की नियमित निगरानी हो और जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित न रहे। अब देखना होगा कि ‘केरलम संकल्प’ और डिजिटल निगरानी के प्रस्तावों को जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।