उमर अब्दुल्ला सरकार पर संकट के बादल? नेशनल कॉन्फ्रेंस के 25 विधायकों ने दिया 14 दिन का अल्टीमेटम
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Jammu-Kashmir Government Crisis
नेशनल कॉन्फ्रेंस के करीब 25 विधायकों के असंतोष की खबर, 14 दिन का कथित अल्टीमेटम।
सभी मौजूदा मंत्रियों को हटाकर नए मंत्रिमंडल के गठन की मांग।
सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने 3 नवंबर को इस्तीफे की घोषणा की।
Jammu / जम्मू-कश्मीर की सत्ता में सब कुछ ठीक नहीं दिख रहा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। 25 विधायकों के कथित अल्टीमेटम और एक सांसद के इस्तीफे की घोषणा ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है।
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार के सामने इस समय दोहरी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ पार्टी के कई विधायक मंत्रिमंडल और संगठन में बड़े बदलाव की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने 3 नवंबर को पार्टी और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेशनल कॉन्फ्रेंस के करीब 25 असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को 14 दिनों का अल्टीमेटम दिया है। उनकी चेतावनी है कि निर्धारित समय में मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे राजभवन जाकर सरकार से अपना विधायी समर्थन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इस कथित विरोध से जुड़े एक पत्र पर 16 विधायकों के हस्ताक्षर हैं। वहीं, बागी खेमे के समन्वयकों का दावा है कि नौ अन्य विधायक भी उनके साथ हैं, लेकिन शहर से बाहर होने के कारण दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं कर सके। दूसरी ओर, कुछ अन्य मीडिया रिपोर्टों में असंतुष्ट विधायकों की संख्या करीब 20 बताई गई है। ऐसे में इस समूह की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं।
अब बात करते हैं विधायकों की मांगों की। असंतुष्ट नेताओं की पहली मांग है कि मौजूदा सभी मंत्रियों को उनके विभागों से हटाकर मंत्रिमंडल का नए सिरे से गठन किया जाए। इसके साथ ही मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को तत्काल पद से हटाने की मांग भी की गई है।
विधायक चाहते हैं कि नई मंत्रिपरिषद का गठन पारदर्शी और योग्यता आधारित प्रक्रिया से हो। उनका कहना है कि मंत्रियों की नियुक्ति और विभागों के बंटवारे में पूरे विधायक दल से सलाह ली जानी चाहिए, न कि कुछ चुनिंदा नेताओं के आधार पर फैसले होने चाहिए।
सिर्फ मंत्रिमंडल ही नहीं, विधायकों ने पार्टी की वैचारिक प्रतिबद्धताओं को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35ए और जम्मू-कश्मीर से जुड़े अन्य संवैधानिक सुरक्षा प्रावधानों की बहाली के मुद्दे को केंद्र सरकार के सामने मजबूती से उठाया जाए।
हालांकि, पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस घटनाक्रम को बगावत मानने से इनकार किया है। वरिष्ठ विधायक अब्दुल मजीद लर्मी ने इसे पार्टी को मजबूत करने और संगठन में सुधार लाने की कोशिश बताया है। वहीं, कश्मीर में पार्टी के प्रांतीय अध्यक्ष शोएब मीर ने भी विधायकों की बैठक को पार्टी विरोधी गतिविधि बताने से परहेज किया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का मामला भी अहम हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि पार्टी नेतृत्व ने अनुच्छेद 370 की बहाली और जम्मू-कश्मीर के अधिकारों की रक्षा से जुड़े चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं किए। उन्होंने 3 नवंबर को पार्टी और लोकसभा की सदस्यता छोड़ने की घोषणा की है।
अब विधानसभा के आंकड़ों पर नजर डालें तो जम्मू-कश्मीर की 90 सदस्यीय विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायक हैं। पार्टी के साथ कांग्रेस, निर्दलीय और सीपीआईएम के विधायक भी गठबंधन में शामिल हैं। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में NC विधायक वास्तव में सरकार से समर्थन वापस लेते हैं, तो सरकार का बहुमत गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
फिलहाल, नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व असंतुष्ट विधायकों से बातचीत कर इस विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहा है। अब सवाल यह है कि क्या उमर अब्दुल्ला पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष को नियंत्रित कर पाएंगे, या आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा?