सरिस्का बना बाघ संरक्षण का वैश्विक मॉडल, भूपेंद्र यादव ने गिनाईं भारत की उपलब्धियां
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Sariska Tiger Reserve
सरिस्का में बाघ पुनर्वास के 18 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित।
भूपेंद्र यादव ने बाघ संरक्षण और प्रोजेक्ट चीता की उपलब्धियां गिनाईं।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी को संरक्षण की सफलता का आधार बताया।
Delhi / राजस्थान के अलवर स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बाघ संरक्षण और वन्यजीव पुनर्वास को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें रखीं। "बाघों का पुनर्वास: अवसर और चुनौतियां" विषय पर आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य देश में बाघों के संरक्षण, पुनर्वास और वैज्ञानिक प्रबंधन से जुड़े अनुभवों और भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा करना था।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और राजस्थान सरकार के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के बाघ अभ्यारण्यों के अधिकारी, वन्यजीव विशेषज्ञ और संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक शामिल हुए। यह कार्यशाला सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों के पुनर्वास के 18 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित की गई।
अपने संबोधन में भूपेंद्र यादव ने कहा कि बाघ संरक्षण केवल एक वन्यजीव की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जंगल, जल स्रोतों और जैव विविधता को सुरक्षित रखने का अभियान है। उन्होंने सरिस्का के पुनर्वास कार्यक्रम को विश्व का पहला सफल वैज्ञानिक बाघ पुनर्वास अभियान बताते हुए कहा कि यह संरक्षण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। वर्ष 2005 में सरिस्का में बाघ पूरी तरह समाप्त हो चुके थे, लेकिन वैज्ञानिक प्रयासों, बेहतर प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के सहयोग से आज यहां 56 बाघों की मौजूदगी है।
मंत्री ने कहा कि भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। पिछले एक दशक में देश में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है। साथ ही भारत ने 2022 तक बाघों की संख्या दोगुनी करने के वैश्विक लक्ष्य को भी सफलतापूर्वक हासिल किया। उन्होंने बताया कि सरिस्का और पन्ना जैसे बाघ अभ्यारण्यों की सफलता के पीछे स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण रही है।
भूपेंद्र यादव ने प्रोजेक्ट चीता का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की सफलता में भी स्थानीय लोगों का सहयोग अहम भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों के विकास को साथ-साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। केवल पर्यटन को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के हितों और आजीविका का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
कार्यशाला के दौरान मंत्री ने तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन किया। इनमें "भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन पर रोडमैप", "भारत में बाघों के संरक्षण और पुनर्वास पर पुस्तिका" तथा "प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक रिपोर्ट" शामिल हैं। इन दस्तावेजों में बाघों के पुनर्वास, आवास प्रबंधन, संरक्षण रणनीतियों और चीता परियोजना की प्रगति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जिन क्षेत्रों में बाघ और हाथियों के आवास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, वहां वन्यजीव गलियारों और प्राकृतिक संपर्क को बनाए रखना बेहद जरूरी है। इससे वन्यजीवों की आवाजाही और पारिस्थितिक संतुलन सुरक्षित रहेगा।
कार्यशाला में बाघों के पुनर्वास, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने, पर्यावास बहाली, वन्यजीव स्थानांतरण और आधुनिक निगरानी तकनीकों पर विस्तृत चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सरिस्का, पन्ना और अन्य बाघ अभ्यारण्यों के अनुभव साझा किए और भविष्य की संरक्षण रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी वन्यजीव प्रजाति विलुप्त न हो। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक सोच, सामुदायिक भागीदारी और संवेदनशील संरक्षण नीति के माध्यम से भारत वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में दुनिया के लिए एक उदाहरण बन सकता है।