Himachal Pradesh Warning | हिमाचल की 4 ग्लेशियल झीलों पर Early Warning System, आपदा से निपटने की तैयारी
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Himachal Pradesh Early Warning
हिमाचल की चार प्रमुख ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित होगा।
जलस्तर और झीलों के आकार में बदलाव की लगातार निगरानी की जाएगी।
संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों और आबादी का विस्तृत आकलन किया जाएगा।
Shimla / नेपाल में ग्लेशियल झील फटने से हुई तबाही के बाद हिमाचल प्रदेश में भी ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित खतरे को लेकर सरकार और आपदा प्रबंधन तंत्र सतर्क हो गया है। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी बढ़ाने और आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने चार प्रमुख ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की कवायद तेज कर दी है।
चार ग्लेशियल झीलों की पहचान
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के विशेष सचिव पुष्पेंद्र राणा के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में चार ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिनका क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से अधिक है और जिन्हें विशेष निगरानी की जरूरत है।
इनमें किन्नौर की काशा घाट झील, सांगला की बास्पा झील, लाहौल-स्पीति की गेपांग गाथ झील और मनाली की वासुकी झील शामिल हैं। इन झीलों में जलस्तर और आकार में होने वाले बदलावों पर विशेष नजर रखी जा रही है।
बदलाव होते ही मिलेगी चेतावनी
प्रस्तावित अर्ली वार्निंग सिस्टम का उद्देश्य ग्लेशियल झीलों में होने वाले असामान्य बदलावों की समय रहते पहचान करना है। यदि किसी झील के जलस्तर या उसके आकार में तेजी से बदलाव होता है, तो संभावित खतरे को लेकर पहले ही चेतावनी जारी की जा सकेगी।
पुष्पेंद्र राणा ने बताया कि हिमाचल सरकार इस दिशा में सी-टैक एजेंसी के संपर्क में है। एजेंसी की ओर से पूर्व चेतावनी प्रणाली का परीक्षण भी किया जा चुका है। फिलहाल इस सिस्टम से संबंधित प्रस्ताव राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के स्तर पर चर्चा में है।
गेपांग गाथ झील पर भी विशेष नजर
प्राधिकरण उन ग्लेशियल झीलों पर खास ध्यान दे रहा है, जिनके आकार में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। गेपांग गाथ झील के आकार में हुए बदलाव को लेकर भी परीक्षण किया गया है। ऐसे बदलाव भविष्य में संभावित खतरे का संकेत दे सकते हैं, इसलिए इन क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
सिर्फ झीलों की निगरानी काफी नहीं
आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, केवल ग्लेशियल झीलों की निगरानी करना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि अगर किसी झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलता है, तो उसका प्रभाव कितने बड़े क्षेत्र तक पहुंच सकता है।
इसी उद्देश्य से प्रमुख ग्लेशियल झीलों के नीचे आने वाले क्षेत्रों का भी अध्ययन किया जा रहा है। इसमें संभावित जलस्तर, पानी के बहाव और प्रभावित होने वाली आबादी का आकलन किया जाएगा। इसके आधार पर संवेदनशील इलाकों में आवश्यक सुरक्षा उपायों और आपदा प्रबंधन की योजना तैयार की जाएगी।
नेपाल की हालिया आपदा ने ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम को एक बार फिर सामने ला दिया है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश में समय रहते चेतावनी देने वाली तकनीक और संभावित प्रभावित क्षेत्रों की पहचान पर जोर दिया जा रहा है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में नुकसान को कम किया जा सके।